कहते हैं…
भगीरथ ने गंगा को धरती पर बुलाया था,
पापों को धोने के लिए।
पर किसी ने यह नहीं सोचा था —
कि एक दिन पाप इतने बढ़ जाएँगे,
कि गंगा खुद को बचाने लौट जाएगी।
कलियुग था…
लोग पाप नहीं करते थे,
पाप जीते थे।
गंगा बहती रही…
शुरू में पवित्र थी,
फिर सहने लगी,
फिर समझने लगी…
और आखिर में…
थक गई।
एक दिन भागीरथी ने आँखें उठाईं,
और कहा —
"बस।
अब और नहीं।"
उसने अपनी ही आत्मा को पुकारा,
और गंगा से कहा —
"लौट जाओ…
यह धरती अब तुम्हारे लायक नहीं रही।"
और गंगा…
जो कभी शुद्धि थी,
आज स्वयं शुद्धि ढूँढ़ने निकल पड़ी।
वह वापस आसमान की तरफ उठी,
शहरों के शोर को पीछे छोड़कर…
इंसानियत की चीखों को अनदेखा करके।
लोग खड़े देखते रहे…
पर किसी ने रोका नहीं।
शायद सब जानते थे —
वह जाने के लिए ही आई थी।
कैलाश पर…
शिव ने महसूस किया —
उनकी जटा हल्की हो गई है।
उन्होंने हाथ लगाया…
गंगा नहीं थी।
ना कोई धार,
ना कोई स्पर्श…
सिर्फ एक सूखा सा शून्य।
और उस पल…
शिव ने पहली बार
अपनी आँखों में आँसू महसूस किया।
ना तांडव हुआ,
ना प्रकोप…
सिर्फ एक धीमे से बोल निकला —
"जिसे मैं संभाल न सका…
उसका भगवान होने का क्या अधिकार? "
उन्होंने अपनी जटा खोल दी,
त्रिशूल ज़मीन पर रख दिया…
और आँखें बंद कर लीं।
ना समाधि थी,
ना ध्यान…
यह त्याग था।
शिव ने इस बार विष नहीं पिया…
उन्होंने अपनी ही ज़िम्मेदारी पी ली।
और धीरे-धीरे…
उनका अस्तित्व पिघलने लगा।
नंदी चीखा…
पार्वती ने पुकारा…
पर शिव ने लौटकर नहीं देखा।
क्योंकि इस बार,
प्रलय बाहर नहीं…
अंदर हो रहा था।
आज भी…
जब तुम किसी सूखी नदी के किनारे खड़े होते हो,
या गंगा में गंदगी देखकर आँख फेर लेते हो…
तो समझ लेना —
गंगा वापस जा चुकी है,
और शिव…
सिर्फ कहानियों में बचे हैं।
यह कलियुग का सबसे बड़ा श्राप है…
कि भगवान नहीं मरे —
हमने उन्हें जीने लायक दुनिया देना छोड़ दिया।
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