आज रात
मैं लिख सकता हूँ—
सबसे उदास पंक्तियाँ।
लिख सकता हूँ
कि आसमान
कितना विशाल है,
और मेरे भीतर
कितना सन्नाटा।
लिख सकता हूँ
कि तारों की रोशनी
भी आज
थकी-थकी लगती है—
जैसे वो भी
किसी खोए हुए प्रेम की
गवाही दे रही हो।
आज रात
हवा में ठंडक है,
और मेरी यादों में
तुम्हारा ताप।
मैं लिख सकता हूँ
कि तुम्हारे बिना
मेरी आवाज़
अपने ही शब्दों से
अजनबी हो गई है।
कि जब मैं हँसता हूँ
तो हँसी
मेरे चेहरे तक आती है,
मेरे दिल तक नहीं।
मैं लिख सकता हूँ
कि मैं
तुमसे प्रेम करता था—
हाँ, करता था।
और तुम
मेरे प्रेम की
एक खूबसूरत आदत नहीं थीं,
तुम
मेरी ज़रूरत का
पूरा अर्थ थीं।
कभी तुम
मेरे कंधे के पास
खड़ी होती थीं,
और रात
कम लंबी लगती थी।
तुम्हारी आँखों में
कुछ ऐसा था
जो मेरे भीतर
"घर" बनाता था।
आज
वही रात है,
पर तुम्हारे बिना—
और यही फर्क
मुझे तोड़ता है।
मैं लिख सकता हूँ
कि वो तुम्हारे बाल
जो हवा में उड़ते थे,
आज हवा
खाली-खाली है।
मैं लिख सकता हूँ
कि तुम्हारे स्पर्श के बाद
मेरी त्वचा
अब भी
तुम्हें ढूँढती है।
कभी तुम
बहुत पास थीं।
इतनी पास
कि तुम्हारा नाम
मेरी साँसों में
समाया रहता था।
और आज
तुम दूर हो—
इतनी दूर
कि मेरी याद
तुम तक पहुँचते-पहुँचते
थक जाती है।
मैं लिख सकता हूँ
कि मैंने तुम्हें
चाहा था
सबसे सच्चे तरीके से—
बिना शर्त,
बिना शोर,
बिना हिसाब।
पर अब
मेरे पास
बस एक सच बचा है—
कि प्रेम
कभी-कभी
किसी की मौजूदगी नहीं,
उसकी कमी बन जाता है।
आज रात
मैं लिख सकता हूँ
कि मैं तुम्हारा नहीं हूँ,
और तुम मेरी नहीं।
कि किसी और के घर की रोशनी में
तुम हँस रही हो शायद,
और मैं
अपने कमरे की दीवारों पर
तुम्हारी परछाईं
ढूँढ रहा हूँ।
और फिर भी…
मैं लिख सकता हूँ
कि मैंने तुम्हें
भुलाया नहीं है।
तुम्हें भुलाना
मेरे बस में नहीं—
क्योंकि तुम
सिर्फ़ याद नहीं,
मेरे भीतर की
एक भाषा हो।
आज रात
मैं लिख सकता हूँ
सबसे उदास पंक्तियाँ—
और वो पंक्तियाँ
खुद को नहीं,
मुझे जलाएँगी।
क्योंकि ये रात
बस रात नहीं—
यह मेरा अकेलापन है
जो शब्द बनकर
कागज़ पर गिर रहा है।
हाँ…
आज रात मैं लिख सकता हूँ
सबसे उदास पंक्तियाँ।
और सबसे उदास पंक्ति
ये नहीं कि
तुम चली गईं—
सबसे उदास पंक्ति
ये है कि—
तुम कभी मेरी थीं…
और अब
मैं बस तुम्हारी याद हूँ।
— पुष्प सिरोही
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