तुम्हारे पास आने की इजाज़त Poem by Pushp Sirohi

तुम्हारे पास आने की इजाज़त

आओ…
और इस दुनिया की थकान
अपने कंधों से उतार दो—
जैसे कोई रात
चाँद को सलीके से
आसमान पर रख देती है।

अपने बाल खोलो—
कि हवा भी
आज तुम्हारे नाम
धीरे से बहना सीख ले,
और मेरे कमरे की खामोशी
तुम्हारी खुशबू से
अर्थ पा जाए।

तुम्हारा दुपट्टा
सिर्फ कपड़ा नहीं—
मेरे लिए
वो पर्दा है
जिसके पीछे
मेरी धड़कनें
और तेज़ हो जाती हैं।

आओ…
अपनी चूड़ियाँ उतारो,
उनकी खनक
मेरे दिल के भीतर
धीरे-धीरे उतरने दो—
जैसे मंदिर में
घंटी की आवाज़
प्रार्थना बन जाती है।

अपने पायल खोलो,
और मेरे पास बैठो—
आज वक्त को
किसी घड़ी की
ज़रूरत नहीं।

मैं तुम्हें
एक "वस्तु" की तरह नहीं,
एक "आकाश" की तरह चाहता हूँ—
जिसमें मेरी सांसें
खुलकर उड़ सकें।

मैं चाहता हूँ
तुम्हारी हर झिझक
मेरे हाथों में
नम होकर गिर जाए,
और तुम्हारी आँखों में
सिर्फ भरोसा रह जाए।

तुम्हारी त्वचा पर
चाँदनी नहीं,
मेरी इज़्ज़त उतरे—
क्योंकि सच्ची चाहत
लूटती नहीं,
संभालती है।

आओ…
आज मैं तुम्हारे सामने
अपना अहं उतार दूँ,
अपने सारे डर
कमरे के बाहर रख दूँ,
और बस
एक प्रेमी बनकर रहूँ—
साधारण,
पर पूरा।

तुम जब पास आती हो
तो मेरा शरीर नहीं,
मेरी आत्मा जागती है—
और मेरे भीतर
एक नया संसार
धीरे-धीरे खुलता है।

अगर ये रात
सिर्फ रात न रहे—
अगर ये लम्हा
इश्क़ की इबादत बन जाए—
तो समझ लेना
मैंने तुम्हें
पूरे सम्मान के साथ
अपना बना लिया।

आओ…
और मेरे दिल के दरवाज़े पर
अपना नाम रख दो—
मैं उसे
किसी ताले में नहीं,
अपनी सांसों में
हमेशा के लिए रख लूँगा।

— पुष्प सिरोही

तुम्हारे पास आने की इजाज़त
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