हवा और फ़रिश्ते Poem by Pushp Sirohi

हवा और फ़रिश्ते

रूह अगर अकेली रहे—
तो वह सिर्फ़ एक प्रार्थना है,
और देह अगर अकेली रहे—
तो वह सिर्फ़ एक प्यास।

पर प्रेम—
जब इन दोनों को जोड़ देता है,
तो सांस भी
एक मंत्र बन जाती है,
और स्पर्श भी
इबादत।

तुम्हारी आत्मा
हवा जैसी थी—
अनदेखी, उजली,
हर जगह फैलती हुई;
मैं उसे महसूस तो करता था,
पर पकड़ नहीं पाता था।

फिर तुम आईं—
देह की तरह
एक सुन्दर आकार लेकर,
और वही हवा
मेरे सामने
फ़रिश्ता बनकर खड़ी हो गई।

जैसे फ़रिश्ते को
दिखने के लिए
पंखों का वस्त्र चाहिए,
वैसे ही रूह को
जीने के लिए
देह की धूप चाहिए।

तुम्हारी आँखों में
मेरे लिए जो भाव था—
वो कोई साधारण चमक नहीं,
वो तो
मेरी आत्मा की भाषा थी
जिसे देह ने
मुस्कान में ढाल दिया।

और जब मैंने
तुम्हारा हाथ पकड़ा—
तो समझा:
स्पर्श केवल त्वचा का नहीं,
स्पर्श तो
दो आत्माओं की
पहली पहचान भी है।

कई लोग कहते हैं—
"पवित्र प्रेम" देह से परे होता है;
पर मैं कहता हूँ—
देह के बिना प्रेम
अधूरा फ़रिश्ता है,
और रूह के बिना देह
एक खाली मंदिर।

तुम्हारे पास आकर
मेरे भीतर की तपस्या
कठोर नहीं रही—
वो बस
गहरी हो गई।

क्योंकि
तुम मेरे लिए
एक ही समय में—
हवा भी हो,
और फ़रिश्ता भी;
एक ऐसी उपस्थिति
जो छू भी सकती है
और बचा भी सकती है।

और मैं—
तुम्हारी देह में
तुम्हारी रूह का घर ढूँढ़ता हूँ,
ताकि मेरा प्रेम
सिर्फ़ इच्छा न रहे—
बल्कि
एक दिव्य सत्य बन जाए।

— पुष्प सिरोही

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