पितृ-ऋण
किसी कागज़ पर लिखा
कर्ज़ नहीं होता—
ये तो वो मौन कथा है
जो हमारी रगों में
रक्त की तरह बहती है।
ये वो दुआएँ हैं
जो बिना बोले
सदियों से
हमारे सिर पर छत बनकर
टिकी हुई हैं।
हम आज
जिस रौशनी में चलते हैं,
उस रौशनी के पीछे
कई पीढ़ियों का अंधेरा है—
जिसे उन्होंने
अपने हिस्से में रखा,
और हमें
उजाला दे दिया।
हमारी हँसी के पीछे
किसी पिता की
चुप्पी होती है,
हमारी जीत के पीछे
किसी दादा की
टूटी हुई उम्मीदें होती हैं—
जिन्हें उन्होंने
हमारे लिए
फिर से जिंदा किया।
पितृ-ऋण
सिर्फ़ युद्ध के मैदान में
बहाए रक्त का नाम नहीं,
ये तो
किसान की दरार पड़ी हथेली,
मज़दूर के झुके कंधे,
माँ के टूटे सपने,
और पिता की
बिना कहे ज़िम्मेदारी का नाम है।
उनका त्याग
कभी नारे नहीं बनता,
बस इतिहास बन जाता है।
हमारे पूर्वज
जिनके पास
सुविधाएँ नहीं थीं,
पर संस्कार थे।
जिनकी जेबें
खाली हो सकती थीं,
पर इरादे
हमेशा भरे रहते थे।
उन्होंने
अपने आराम को
हमारे भविष्य में बदल दिया,
अपनी ज़रूरतों को
हमारे सपनों में पिरो दिया।
पितृ-ऋण का अर्थ है—
अपनी जड़ों को
कभी न भूलना।
उस मिट्टी को
कभी न अपमानित करना
जिस मिट्टी ने
हमें नाम दिया है।
पितृ-ऋण का अर्थ है—
संस्कार को
मजबूत रखना,
घर के बुज़ुर्गों की
इज़्ज़त में
अपना चरित्र रखना।
जब हम
त्योहार मनाते हैं,
तो सिर्फ़ खुशी नहीं होती—
हम अनजाने में
उन पितरों को प्रणाम करते हैं
जिनकी मेहनत से
हमारा घर
घर बन पाया।
और जब हम
तिरंगा देखते हैं,
तो ये भी याद आता है—
आज का गौरव
कल के बलिदान का
उत्तराधिकार है।
पितृ-ऋण
कभी उतरता नहीं,
क्योंकि यह
रक्त में होता है,
और रक्त
कभी किसी से
अलग नहीं होता।
हाँ…
इसका मान
हम इतना कर सकते हैं कि—
हम अपने कर्म से
उस ऋण को
सम्मान बना दें।
आओ आज
एक प्रण लें—
अपने पूर्वजों की
इज़्ज़त को
हम कभी कम नहीं होने देंगे।
हम उनके नाम को
अपने कर्म से
और ऊँचा करेंगे।
हम सच्चाई छोड़ेंगे नहीं,
मेहनत छोड़ेंगे नहीं,
संस्कार छोड़ेंगे नहीं,
और भारत की मिट्टी की
मर्यादा
कभी तोड़ेंगे नहीं।
क्योंकि…
जो पितृ-ऋण को निभाता है,
वो सिर्फ़ अच्छा बेटा नहीं,
वो अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए
धरोहर बन जाता है। 🇮🇳🕯️
— पुष्प सिरोही
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