सर्वोत्तम सुख Poem by Pushp Sirohi

सर्वोत्तम सुख

मैंने सुख को
सोने की थाली में नहीं देखा—
मैंने उसे
दो हथेलियों के बीच
धीरे से धड़कते पाया है।

मैंने उसे
राजमहलों की खिड़कियों में नहीं,
एक साधारण-सी साँस में देखा—
जब कोई अपना
बिना कहे
साथ बैठ जाता है।

सुख कोई शोर नहीं,
सुख कोई जीत नहीं—
सुख तो
वक़्त की गर्द में
एक साफ़-सा नाम है।

लोग कहते हैं—
"सब कुछ पा लो, "
पर मैंने जाना
सब कुछ
किसी एक को खो देने का
दूसरा नाम भी हो सकता है।

मुझे तो
सर्वोत्तम सुख वही लगा—
जब किसी की आँखों में
मेरी थकान उतरती थी
और वो उसे
अपने प्यार से
हल्का कर देती थी।

मैंने देखा है—
किसी के स्पर्श में
बारिश का धर्म होता है,
जो धूल नहीं—
दर्द धोता है।

और किसी की हँसी में
मंदिर की घंटी,
क्योंकि
वो आत्मा के भीतर
दीप जगा देती है।

सर्वोत्तम सुख
वो नहीं
जब दुनिया हमें सलाम करे,
सर्वोत्तम सुख तो वो है
जब एक दिल
हमारे भीतर
घर बना ले।

ऐसा घर
जो शब्दों से नहीं—
विश्वास से बने,
जहाँ ईर्ष्या की हवा
दरवाज़ा भी न छू सके।

मैंने सुख को
आसमान से नहीं माँगा,
मैंने तो उसे
एक नज़र के
काजल में देखा—
जो कहता था:
"तुम हो…
तो सब है।"

और हाँ,
सबसे बड़ा सुख—
सिर्फ मिलना नहीं…
उस मिलन में
अपने "मैं" का
पिघल जाना है।

जैसे
नदी समुद्र में गिरकर
अपना नाम खो देती है,
पर बदले में
अनंत हो जाती है।

सुख—
वही अनंतता है,
जो प्रेम के एक क्षण में
पूरी ज़िंदगी बन जाती है।

— पुष्प सिरोही

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