झुकने का मसला Poem by Pushp Sirohi

झुकने का मसला

और अगर मसला
मेरे झुकने से ख़त्म होगा,
तो बेफ़िक्र रहना—
ये मसला ज़िंदगी भर चलेगा।

क्योंकि हमसे झुकने की उम्मीद
कुछ वैसी ही है
जैसी अदालत से कहना—
साहब, कानून थोड़ा आज छुट्टी पर भेज दीजिए! 😄

हम गर्दन
सिर्फ़ संविधान, न्याय और सत्य के आगे झुकाते हैं,
बाक़ी लोगों के लिए
रीढ़ की हड्डी ने स्थायी अवकाश ले रखा है।😎

तुम कहते हो—
थोड़ा समझौता कर लो।

हम कहते हैं—
ज़रूर करेंगे…
पहले बताइए,
किस धारा में इसका प्रावधान है? 😂

तुम कहते हो—
इतनी बहस क्यों करते हो?

हम मुस्कुराकर कहते हैं—
जनाब, बहस हमारी आदत नहीं,
हमारा पेशेवर संस्कार है।

हम ख़ामोश रहें
तो समझना मामला गंभीर है;
क्योंकि जब विधिशास्त्र का विद्यार्थी
बोलना बंद कर दे,
तो अक्सर
उसने तर्कों की फाइल खोल ली होती है। 📚

हम डरते नहीं,
बस कभी-कभी सामने वाले को
अपनी ही दलील पूरी करने का अवसर देते हैं। 😏

और अगर कोई फिर भी कहे—
झुक जाओ, मसला ख़त्म हो जाएगा।

तो विनम्र निवेदन है—

आप मसला ख़त्म करने की चिंता छोड़िए,
हम उसे विधिशास्त्र का विषय बना देंगे। 😂

क्योंकि हम
सिर्फ़ कानून पढ़ते नहीं,
कानून के पीछे छिपे
तर्क, न्याय और समाज को भी पढ़ते हैं।

इसलिए याद रखिए—

हमारी गर्दन झुकाना कठिन नहीं,
बस सामने न्याय होना चाहिए।

वरना—

मसला आपका होगा,
बहस हमारी होगी,
दलीलें हमारी होंगी,
और…
समय का पहिया भी अपना होगा।😎⚖️

क्योंकि जनाब,
हम विधिशास्त्र के ज्ञाता हैं—
और हमें बेवजह उलझाने वालों को
अक्सर पता ही नहीं चलता
कि उन्होंने सवाल पूछा था…
या पूरा शोध-विषय दे दिया था! 😂⚖️

Friday, September 25, 2026
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