पुनर्जन्म Poem by Pushp Sirohi

पुनर्जन्म

दिन भर
मैंने समय को
कंधों पर ढोया—
फाइलों की धूल,
लोगों की अपेक्षाएँ,
और अपने ही भीतर की
थकन का शोर।

मेरे चेहरे पर
दुनिया की भीड़ थी,
मेरी आँखों में
कर्तव्य का भारी पानी।
मैं पुरुष था—
और पुरुष होना
कई बार
अपने दर्द को
चुपचाप निगलना होता है।

फिर तुम आईं—
किसी दवा की तरह नहीं,
किसी आदेश की तरह नहीं;
बस
एक शांत साँस की तरह—
जो जीवन को
फिर से सरल बना देती है।

तुम्हारी हँसी
मेरे भीतर
अटकी हुई धूप थी—
जो निकलते ही
कमरा रोशन कर देती है।

मैंने पहली बार
अपने भीतर
खुद को ढीला होते देखा—
जैसे लोहे का आदमी
किसी नदी में उतरकर
अपनी कठोरता
धीरे-धीरे खो दे।

हमने कुछ बड़ा नहीं किया—
न युद्ध जीता,
न दुनिया बदली,
बस थोड़ी देर
जीवन को
जीवन बनने दिया।

तुम्हारे पास बैठकर
मैंने जाना—
प्रेम कोई सजावट नहीं,
वह तो
थके हुए आदमी की
रूह के लिए
पुनर्जन्म है।

तुमने मेरे माथे से
चिंताओं की लकीरें
नहीं मिटाईं—
तुमने बस
मेरे भीतर की
आग को
हवा दे दी।

और मैं—
फिर से
खुद पर लौट आया;
वही मैं
जो मेहनत करता है,
जो गिरता नहीं,
पर कभी-कभी
भीतर से
सूख जाता है।

तुम्हारे साथ
मैंने दोबारा
हँसना सीखा,
हल्का होना सीखा,
और यह भी—
कि विश्राम
कमज़ोरी नहीं,
शक्ति का संस्कार है।

जब रात गहरी हुई—
मैंने अपनी आत्मा से कहा:
"देख,
ज़िंदगी सिर्फ़ जीत नहीं,
ज़िंदगी
पुनर्सृजन भी है।"

और तुम
मेरी उस जीत का नाम नहीं,
मेरे जीने का नाम हो—
जो थकन के बाद
फिर से शुरू होता है।

— पुष्प सिरोही

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