।। हमारा गांव ही अच्छा ।। Poem by Rajnish Rajan

।। हमारा गांव ही अच्छा ।।

निकला हूँ गाँव छोड़कर,
घरवालों को यह बोलकर,
जा रहा हूँ मैं शहर,
आऊँगा कुछ रुपये जोड़कर।

शहर की शाम में बैठा हूँ,
हवाओं का गम साथ लिए हूँ,
धधकती आग को क्या सेकूँ,
चिंगारी की चमक ढूँढता हूँ।

दर-ब-दर सुनसान गलियों में,
भटकती भीड़ में तन्हाई,
एहसास में बंदिशों की हवाएँ,
शहर में मैं अकेला,
गाँव की चौभट्टी की खुशबू,
हमारा गाँव ही अच्छा।

सिसकती सांस का हिस्सा,
मचलती तृष्णा का गच्छा,
शराबी संगी का किस्सा,
हमारा गांव ही अच्छा।

जोड़ा हूँ कुछ रुपये,
हसीन छावनी छोड़कर,
कसमकस भरी सांसें,
अब गाँव लौटता हूँ।

© रजनीश राजन ✍️

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