मां—मां होती है,
एक साक्षात जन्नत होती है।
कठिन से कठिन भाषा का,
वो सरल 'Decoder' होती है।
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'मंज़िल की संधान-क्षुधा में,
राही निज पथ भूल गया;
पाने की अंधी चाहत में,
वो जीवन का रस भूल गया।'
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रुनझुन करती ये तेरी पायल,
खनक पायल बताए रे,
तोहरी मस्तानी चाल है।
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मैं बिहार हूँ,
कोई पुकारे 'ऐ बिहार', कोई कहे 'बिहारी' है,
पर गर्व से भर जाता हूँ मैं, ये पहचान ही न्यारी है।
जानकर ये हर्षित होता हूँ— कि हाँ, मैं बिहार हूँ।
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सिसकती हुई रात, याद आती है,
वही टीस दिल को, सता जाती है।
रातें थीं पर था, अँधेरा नहीं,
वहाँ पर था बस, वास तेरा वही।
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नभ के कठिन प्रांगण खड़ा, मार्तण्ड का अभिमान है;
ज्वाला बिखरती रश्मियाँ, झुलसा रहा भू-भाग है।
आतप विकल वसुधा हुई, झुलसा रहा जग-प्राण है;
पश्चिम क्षितिज के छोर पर, यह तेज भी ढल जाएगा।
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मैं
ब्रह्मांड की सबसे बड़ी पहेली है,
जिसे हम गहराई से कभी टटोलते नहीं हैं।
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प्रेम-अनुनय करता हूँ तुमसे, स्मृतियों में अनुराग भरो,
दग्ध हो रहा विरह-तपन में, यादों को मधु-सिक्त करो।
मन्थित तुम कर न सकोगी, यादों को अब हाला कर दो,
पात्र-अतीत से छलकूँगा मैं, मौन सिहरन न पाऊँगा।।
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बालू के ढेर पर बैठकर,
मैं महलों का ख्वाब बुनता हूँ।
राई को मुट्ठी में लिए,
ख्वाबों का एक महल बुनता हूँ।
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आसमान में बढ़ें, हम जमीन पे चलें
हम नहीं झुकने वाले इस वतन के लिए
सर उठा के चलें, सर उठा के बढ़ें
हम फिदा हैं सनम इस वतन के लिए।
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