रुनझुन करती ये तेरी पायल,
खनक पायल बताए रे,
तोहरी मस्तानी चाल है।
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'मंज़िल की संधान-क्षुधा में,
राही निज पथ भूल गया;
पाने की अंधी चाहत में,
वो जीवन का रस भूल गया।'
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मां—मां होती है,
एक साक्षात जन्नत होती है।
कठिन से कठिन भाषा का,
वो सरल 'Decoder' होती है।
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खूब है वो, खुश है वो
मुझसे बिछड़कर,
दूर है वो।
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एक शांत, सुनसान रात,
रात का दूसरा पहर,
लगभग दो बजे।
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बालू के ढेर पर बैठकर,
मैं महलों का ख्वाब बुनता हूँ।
राई को मुट्ठी में लिए,
ख्वाबों का एक महल बुनता हूँ।
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नभ के कठिन प्रांगण खड़ा, मार्तण्ड का अभिमान है;
ज्वाला बिखरती रश्मियाँ, झुलसा रहा भू-भाग है।
आतप विकल वसुधा हुई, झुलसा रहा जग-प्राण है;
पश्चिम क्षितिज के छोर पर, यह तेज भी ढल जाएगा।
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मैं
ब्रह्मांड की सबसे बड़ी पहेली है,
जिसे हम गहराई से कभी टटोलते नहीं हैं।
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एक अनुशासन का पहरा था,
जो बंधन सा लगता था;
वह बंधन नहीं,
समाज को पतन से बचाए रखता था।
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शांत हवा में शोर है बिखरा,
मन का वो अभिमान पिघलकर,
बन बह रहा वो नीर नदी का;
बैठ किनारे मीन को देखा,
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