'मंज़िल की संधान-क्षुधा में,
राही निज पथ भूल गया;
पाने की अंधी चाहत में,
वो जीवन का रस भूल गया।'
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मां—मां होती है,
एक साक्षात जन्नत होती है।
कठिन से कठिन भाषा का,
वो सरल 'Decoder' होती है।
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रुनझुन करती ये तेरी पायल,
खनक पायल बताए रे,
तोहरी मस्तानी चाल है।
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नभ के कठिन प्रांगण खड़ा, मार्तण्ड का अभिमान है;
ज्वाला बिखरती रश्मियाँ, झुलसा रहा भू-भाग है।
आतप विकल वसुधा हुई, झुलसा रहा जग-प्राण है;
पश्चिम क्षितिज के छोर पर, यह तेज भी ढल जाएगा।
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निकला था सत्य की खोज में
गहराती आँखों के साथ,
मैं भटकता गया राहों में
सच्चाई उस पार, मैं इस पार।
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आओ ना तुम.............,
मैं तुमपे कुछ श्रृंगार लिखूँ।
श्रृंगार में तुझको शाम लिखूँ,
संग में मैं तुझे सम्मान लिखूँ।
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नारी पर मैं क्या लिखूं?
जब उसको मैंने पढ़ा नहीं।
बड़ाई में मैं क्या लिखूं?
लिखूं छलावे का सम्मान!
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राख है मेरी ज़िन्दगी, बख़ूबी मैं समझता हूँ।
अजीब था मैं, इस दुनियादारी में बेहाल था।
माना तुम बहुत बड़े तोप हो अपने परदादा का,
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वो होगी पत्थर-दिल किसी और के लिए,
बुततराश हूँ मैं; पत्थर को स्वरूप देता हूँ।
बुत-शिकन होगा वो तराशने की ज़िद में उसने,
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A heart of stone to others' eyes,
But I am he where sculpture lies.
I give the rock its face and form,
To make the cold and lifeless warm.
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देखो, वक्त बदल रहा है,
दुनिया होश खो रही है।
मैं वो वक्त ढूँढता हूँ,
जो दुनिया बदल रहे हैं।
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बहकती आरज़ू है मेरी,
और अंधेरी घनेरी रात।
तेरे बदन की ख़ुशबू में डूबा,
कहो, कैसे करूँ मैं प्यार?
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गाय आस-पास जब वास करे,
सकारात्मकता वह उपजाती है।
गौ नयनों की संरचना समझो,
साक्षात् स्वर्ग दर्शन करवाती है।
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यादों की भंवर का वो हिस्सा,
मैं हूँ उनके जीवन का किस्सा,
जिसने बोया, हकीकत में मैं —
उनकी हस्ताक्षर का हिस्सा हूँ।
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तल्ख़ी काम न आए,
शबनम शाम न छाए,
मुस्कुराकर आँखें मीचना,
हमेशा प्यार नहीं होता।
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मुद्दतें शाम हो गईं,
तड़प भी ग़मगीन हो गई।
उदासी शाम की हद है,
कहानी अफ़सोस रह गई।
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ग़ज़ब है, मुझे नींद में जगाती है।
मैं एक सुकून की नींद चाहता हूँ।
सितम है, सब मशरूफ़ हैं तमाशा देखने में;
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ये तारे, सितारे और ये चाँद,
ये सब तुम्हें उदास दिखेंगे।
देखो अपनी 'चाँद' को, इस बिखरी चाँदनी में,
ख़ुदा कसम वो सदाबहार लगेंगे।
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क्या इश्क़ था,
जिसका ज़िक्र आम था मुआशरे में।
ख़ूब निभाया प्यार को हमने,
कि दास्ताँ जवान हो गई।
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Rajnish Rajan is a promising Indian poet and writer hailing from Birnoudh, Goradih, Bhagalpur, Bihar. His literary journey is deeply rooted in the rural essence and social realities of his homeland. He received his early education at Middle School, Birnoudh, Goradih. Later, he moved to the city for higher studies and graduated from the Mathematics Department of the prestigious Marwari College, Bhagalpur. His academic background in Mathematics brings a unique depth and structural precision to his poetic expressions. His writing is known for its emotional intensity and connection with the common man. Some of his works include: Karahti Raat, Mard Hun Na, Pyar Ki Abhilasha, Mere Mastur, Jine Do Jo Jaise Jite Hai, and Naj e Jawani.)
बेलगाम क्यों दौड़ रहे हो?
'मंज़िल की संधान-क्षुधा में,
राही निज पथ भूल गया;
पाने की अंधी चाहत में,
वो जीवन का रस भूल गया।'
होश गंवा बैठा है जीवन,
यह तो गतिमय एक नियति है;
बेलगाम, बे-ब्रेक दौड़ती,
अंत काल की मौन घड़ी है।
पीड़ित न हो कोई हमसे,
हम सुदृढ़ पथिक बनना भूल गए;
पर-पीडन से मुक्त रहे मन,
परहित पावन सत्कर्म रहे।
प्रतिशोध की अंधी ज्वाला में,
हम निज अस्तित्व जला बैठे;
करुणा, क्षमा को त्याग यहाँ,
हम घृणा का पाश बढ़ा बैठे।
ताक पर रखे सकल सम्बंध,
भ्रम को ही स्वाधीनता माना;
अपनों को ही पराया समझा,
गैरों में निज रूप पहचाना।
आपाधापी के इस युग में,
क्या अवशिष्ट यही परिभाषा?
चैन-सुकून सब विलीन हुआ,
वैभव की अंधी अभिलाषा!
मन की तृष्णा,
मिथ्या आडंबर,
अगणित प्रपंच के छलावे हैं;
भीतर पूर्ण शून्यता का डेरा,
बाहर वैभव के दिखावे हैं।
कण-कण में असत्य का डेरा,
अब झूठ भी सहम कर जीता है;
जब असत्य ही सत्य बन जाए,
तब देख न्याय भी अश्रु पीता है!
औरों को जो आतंकित करते,
स्वयं को कहाँ संभाल पाते हैं?
कोई यहाँ संहार का भागी,
कोई अकाल काल को पाते हैं।
बेलगाम क्यों दौड़ रहे हो?
कुछ तो इसका अर्थ कहो!
जीवन जीना कठिन नहीं है,
सार्थक कर सत्कर्म रहो।
काल चक्र का अविरल पहिया,
सबको नित प्रति बोध कराता;
आज यहाँ जो मुकुटधारी है,
कल वो रेणु में मिल जाता।
कौन यहाँ आत्मीय हमारा?
कौन यहाँ पर मात्र पराया?
मृत्तिका का पुतला है केवल,
यही सृष्टि की शाश्वत माया।
ईश्वर,
आत्मा,
अंतस-चेतना,
विकल सुन रही सबकी व्यथा;
यह जीवन क्या?
मात्र सत्य का,
अविरल बहती अमर कथा।
'मेरी खुद की लिखी कहानी में, मेरे ही किरदार का अंत होता है।'
जब जिंदगी में सभी विकल्प खत्म हो जाए तो एक सच्चा, सरल और समर्पित हो जाओ, सफलता मिलना तय है
'जीवन के पहले दिन से आखिरी सांस तक, जो बच्चे के हर एहसास को बिना कहे समझ ले, उसे ही 'माँ' कहते हैं।
'मेरी फ़ितरत इतनी भी ओछी नहीं कि, लाश का वज़न तौल कर जनाज़े को कंधा दूँ।'
'कमजोरी में तो रूह भी जिस्म का साथ छोड़ जाती है, तुम अपनों से वफा की उम्मीद, मजबूत रहने तक ही रखना।'
'मैं शून्य हूँ, मेरा कोई वजूद नहीं... सब तुम्हारे फैसले का खेल है, पीछे रख कर मुझे मिटा दो, या आगे रख कर अपनी कीमत बढ़ा लो।'