सुखी पत्ती Poem by Rajnish Rajan

सुखी पत्ती

सूखी हुई जो पत्ती है, कल तक उसमें हरियाली थी;
समय-समय की बातें हैं, कल जुड़ा था वो शाखा से।
कल तक तो जो था पेड़ों पर, आज वो सूखी पत्ती है;
वरण था जिसको अभिमानों का, नीचे गिरी वो पत्ती है।

हरियाली का श्रृंगार लिए, इठलाती थी वो हर बात पर;
हवाओं से करती ठिठोलियाँ, पतझड़ को अपनाया है।
सूखी पत्ती जब उड़ती है, पुरानी यादें ताज़ा होती हैं;
दास्तां सुनाती बीते दिनों की, हवाओं से गहरा नाता है।

आज वो सूखी पत्ती है, जो पड़ी है पेड़ों के पैरों पर;
मूल छोड़ जो मन इतराया, आज वो पड़ी है धूल में सूखी।
समय-समय की बातें हैं, खाली नहीं वो पेड़ की शाखा;
हरियाली छोड़ जो नीचे गिरा, वो सूखी पत्ती कहलाती है।

वीरान नहीं है वो शाखा, आज नई पत्तियों से हरियाली है;
प्रकृति और जीवन में रिक्तता, कभी नहीं स्थायी होती।
अगर ये प्रकृति न होती, तो आज ये सूखी पत्ती न होती;
खुद को मिटाकर मिट्टी में मिलना, पत्ती से बेहतर कौन कहे?

नीचे गिरा पर इतना नहीं, मनुष्य गिरे तो कोई काम नहीं;
गिरना भी एक कला है, जब नियत में एक नया सवेरा हो।
गिरकर अपनों के काम आ जाना, उससे भी बड़ी कला है;
गिरकर भी जिसने पेड़ों को सींचा, कल वो सूखी पत्ती थी।

जब बचता कोई चारा नहीं, उस सूखी पत्ती ने सिखाया है;
सत्य, सरल, समर्पित होना ही, आज प्रकृति ने सिखाया है।

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