॥ श्री राधा-गिरिधर दोहावली ॥ Poem by Rajnish Rajan

॥ श्री राधा-गिरिधर दोहावली ॥

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ताप तपन सब मिट गया, हुआ हृदय उपवन।
सुन सुवन गिरि-गिरिधरा, अर्पण यह तन-मन ॥

मगन हुआ मन आत्म में, मिली प्रेम की धार।
सुमन अमन अर्पू तुझे, वंदन बारम्बार ॥

नूतन मंथन मन करे, अंजन नयन लगाय।
तृप्त लोचन शयन अब, अनिमिश दरस पाय ॥

कानन कंचन गगन सम, भाल सजे यह धूल।
चरण रज को पा करके, खिले हृदय के फूल ॥

धूलि तुम्हारी चन्दन सी, पावन पवन समान।
तुच्छ प्राणी शरण हूँ, करूँ चरण संधान ॥

तन मन कीर्तन में रमे, सदा करूँ मैं नमन।
पूर्ण समर्पण प्राण का, राधा चरण तर्पण ॥

किशोरी तू ही गिरिधारी, कृष्ण मिलाई मोय।
राधा रमण मन में बसे, जीवन तृप्त होय ॥

ब्रह्म ज्ञान की स्रोत है, श्री राधा का नाम।
राधा राधा रटत ही, मिले कृष्ण सुख धाम ॥

राधा नाम महिमा बड़ी, कैसे करूँ बखान।
हर अक्षर में ही बसे, मुरलीधर भगवान ॥

भक्ति न जानूँ लाड़ली, शरण तुम्हारी आय।
प्रेमानंद कृपा मिली, मूढ़ मंत्र कमाय ॥
— © रजनीश राजन ✍️

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