मेरी चाँद Poem by Rajnish Rajan

मेरी चाँद

तुम्हें नग़्मों में मैं चाँद कहूँ या कहूँ फागुन की होली।
तू हँसती है तो है मेरी हस्ती, मैं चंदन तू रोली।
कभी-कभी तो लगती मुझको, तेरी मिश्री घोली बोली।

शाम-शाम में चाँद तकूँ मैं, तारे मुझको ताकें,
ताक-ताक के तारे बोलें, मैं जानूँ तेरी नियत खोटी।

तारों से मैं छुप-छुपकर देखूँ तेरे बालों की चोटी,
तारे सितारे शाम शगुन में मुझसे आकर बोले --

तुम आशिक होगे माना मैंने, पर छोड़ो चाँद का पीछा,
वो मेरी चाँद है, छोड़ो उसको, वो तारों की बढ़ाए शोभा।

सूरज की नजरों से बचाऊँ, मेरी चाँद नजर ना आए,
पर्दा नशीं वो चाँद हमारी, शीतल कमल खिलाए।

मैं आँख मिचोली तारे तुमसे, कैसे-कैसे खेला,
वो तेरी, मेरी चाँद हो गयी, तुम तारे सितारे अभागा।

ओ तारे यारे तुम भी सुनो, मैंने चाँद से क्या पूछा,
दूर-दूर से तुझे तारे ताकें, तेरा उनसे क्या है नाता?

मेरी चाँद मुझसे मुस्काई, मुझसे हँस के बोली,
मैं चाँद तुम्हारी भोली-भाली, दूर-दूर तक, ना है कोई नाता।

मेरी चाँद जो मेरे कहने से, वो काली टीका लगाए।
मैं आशिक तेरा कितना पागल, तारे फिर क्या जानें।

© रजनीश राजन ✍️

मेरी चाँद
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