निकला था सत्य की खोज में
गहराती आँखों के साथ,
मैं भटकता गया राहों में
सच्चाई उस पार, मैं इस पार।
नदियों के किनारे मैं बैठा
सत्य हँसती रही उस ओर,
मिथ्या साथ थी मेरी
वह बहकाती गई,
मैं बहकता गया
सत्य की परछाई से दूर।
सत्य की परछाई से
मैं अपना चेहरा छुपाता हुआ
नदी के किनारे - किनारे,
सत्य की खोज में,
सत्य कहाँ? मैं असत्य हुआ।
मेरी अंतरात्मा बेहोश पड़ी
मिथ्या के साथ ठिठोली करते,
नदी का अंतिम छोर ढूँढते
हम समुद्र किनारे जा पहुँचे।
सत्य का विचार अंतर्मन में?
सत्य की परछाई के साये से भी दूर,
मिथ्या की चिकनी - चुपड़ी बातें
और मैं मदमस्त मिथ्या की बाँहों में।
गली में सिसकती सच्चाई
एक आशा के साथ बैठी,
उदास आँखों से तकती राह
मेरी अंतरात्मा बेहोश पड़ी।
समुद्र किनारे की वह खामोशी
मिथ्या की हक़ीक़त से मैं रूबरू,
अंतरात्मा की छूटती बेहोशी
मैं और मेरी आत्मा का वजूद।
सत्य की परछाई के साये की झलक,
गली में सिसकती सच्चाई की भनक,
मैं बर्बादी के कगार पर, एक ही सनक,
सत्य की परछाई से, मैं ही असत्य ।
© रजनीश राजन ✍️
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