अलग-थलग सब होकर अपने, लड़ता है कालचक्र यहाँ,
गति नहीं जब सपनों में, और मति नहीं जब अपनों में।
जिज्ञासा क्या जगाए जीवन, हम असमंजस में जीते हैं,
स्वयं की पहचान ही दर्शन, चलो जीवन-दर्शन करवाते हैं।
बाधाओं की बाधा बनकर, चलता है जो राह यहाँ,
संघर्षों में सरल व सच्चा, करता जो समर्पण यहाँ।
आँधी रोकता मतवाला, सम-विषम सब एक समान,
संघर्षों के शिखर को चूमता, जीता है वो सूर्य समान।
तट पर बैठा मन कहता है, बहती लहरें प्यास बुझा दें,
अंतर्मन की गहराई कहती, खुद को खुद से हमें मिला दें।
बिस्तर की सिलवट में सुख है, पर संघर्षों में है सार छुपा,
स्वयं की जो पहचान है करता, जीता है वो सूर्य समान।
मन खोजता आराम यहाँ, प्रखर बदलावों से डरता है,
आत्मा का स्वभाव है सागर, सीमाएँ तोड़ता रहता है।
असमंजस चीर जो बाहर निकला, नव संकल्प सजाता है,
तज कर डर जो साहस चुनता, वो अपनी राह बनाता है।
आह्वान कर जो संकल्प से जीता, जीता है वो सूर्य समान।
बीता पल वापस ना आता, नदियों की धारा सिखलाती है,
प्रकृति के पहिए संग चलता, वो प्रगति पथिक कहलाता है।
अतीत की यादें, भविष्य की चिंता, ये वर्तमान खा जाता है,
अनुशासन और समय मर्यादा, जीवन का सार सिखाता है।
जो संघर्षी और संकल्पित मन होता, जीता है वो सूर्य समान।,
हार खड़ी जब द्वार पुकारे, तब साहस की परीक्षा होती है,
अंधेरा जितना गहरा होता, सूर्य उतना ही तेजस्वी उगता है।
जग की बातों को शोर समझ, लक्ष्य पर अडिग जो रहता है,
स्वयं से संवाद कर आगे बढ़ता, फिर सूर्य समान वो जीता है।
हस्त लकीरों में जो ना मिलता, पसीने से लिखना पड़ता है,
चांद की रोशनी पाने को, सूर्य को दिनभर तपना पड़ता है।
मेहनत की आंच में तपकर, एक पूर्ण व्यक्तित्व निखरता है,
जलते राह पर जो रुकता नहीं, फिर सूर्य समान वो जीता है।
बीज मिट्टी में दफ़न जब होता, अपना अस्तित्व वो खोता है,
खुद को मिटाकर मिट्टी में, एक विशाल वृक्ष बन पाता है।
जो मिटने का दृढ़-साहस रखता, वही नव जीवन पाता है,
त्याग की आग में तपकर ही, फिर सूर्य समान वो जीता है।
मूरत यूँ ही नहीं बनती, पत्थर को चोट सहना होता है,
नदियाँ बहतीं कल-कल, चट्टान मिले तो दिशा बदलनी होती है।
बाधाओं को ही मार्ग बनाकर, निरंतर आगे बढ़ना होता है
अपनी राह जो स्वयं बनाए, फिर सूर्य समान वो जीता है।
गगन की ऊँचाई नापनी हो, तो पंखों को खोलना पड़ता है,
मौन रहकर जो कर्म करे, उसका व्यक्तित्व बोलता है।
हार को जो सीढ़ी बना ले, इतिहास वही फिर रचता है,
स्वयं को जो जीत ले 'अज्ञानी', फिर सूर्य समान वो जीता है।
अकेले चलना साहस होता है, सबको साथ लाना नेतृत्व,
स्वार्थ से ऊपर उठकर जीना ही, असली जीवन का तत्व ।
बूँद-बूँद को जोड़ जो अपनी, करुणा का सागर भरता है,
औरों के पथ जो रोशन करता, फिर सूर्य समान वो जीता है।
जग बदले या ना बदले, तू खुद को बदलना जारी रख,
सच्चाई की इस राह पर प्यारे, अपनी जंग तू जारी रख।
अंतिम सांस तक जो लड़ता है, काल भी उससे डरता है,
अमर वही जो कर्म से महके, फिर सूर्य समान वो जीता है।
धिक्कार है उस जीवन को, जो चुनौतियों से भाग गया,
वही कहलाता है अमर यहाँ, जो रण में डटकर जीता है।
जंजीरें खुद ही टूटकर गिरता, जब शौर्य शंख बजाता है
जो खून से अपनी प्यास बुझाए, फिर सूर्य समान वो जीता है।
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