स्याही कागज से पोंछता हूँ। Poem by Rajnish Rajan

स्याही कागज से पोंछता हूँ।

देखो, वक्त बदल रहा है,
दुनिया होश खो रही है।
मैं वो वक्त ढूँढता हूँ,
जो दुनिया बदल रहे हैं।

मैं उस काफिले में शामिल हूँ,
जहाँ मजहबी दलाल घूमते हैं।
जिसमें मैं वो वक्त ढूँढता हूँ,
वजह सोचता हूँ,
अभी गुमनाम घूमता हूँ।
स्याही कागज से पोंछता हूँ,
हाँ लिखता हूँ, सोचकर मगर,
स्याही कागज से पोंछता हूँ।

गुमनाम स्याही बन चुका हूँ,
कोई कागज ढूँढ रहा हूँ।
वजह सोचकर लिखूँ जिसपर,
वो हिम्मत ढूँढता हूँ।

हाँ, गुमनाम हो चुका हूँ,
पर कोई सहारा ढूँढता हूँ।
कोई गुमनाम मिल जाए,
जो स्याही कागज पे खींच पाए,
वो गुमनाम ढूँढता हूँ।
स्याही कागज से पोंछता हूँ...

वजह को लिखने से डरता हूँ,
खुलेआम हरकतें बदल रही हैं।
मैं वो सोचता हूँ,
वजह जानता हूँ,
पर लिखने से डरता हूँ।
स्याही कागज से पोंछता हूँ... वजह जानता हूँ... पर लिखने से डरता हूँ।

मैं वो हौसला ढूँढता हूँ,
जो स्याही कागज पर खींच पाए।
वो वक्त ढूँढता हूँ,
जो दुनिया को बोल पाए।
हाँ, जो उम्मीद खींच पाए... वो हौसला ढूँढता हूँ,
स्याही कागज पर खींच पाए... वो आवाज ढूँढता हूँ।

फरिश्तों को ढूँढता हूँ,
आसमाँ झाँकता हूँ,
वजह जानता हूँ,
पर स्याही कागज से पोंछता हूँ।

शाम हो रही है,
आशा लिए खड़ा हूँ।
पंछी भी बोल रहे हैं,
अँधेरा हो चुका है,
पर आशा लिए खड़ा हूँ।

कोई तारे मिल जाएँ,
जो दुनिया को देख पाएँ।
वो आँखें ढूँढता हूँ,
जो जुगनू सा जगमगाएँ।
बस, आशा लिए खड़ा हूँ...।

मैं वो दिन ढूँढता हूँ,
जिसमें सूरज निकल रहा हो।
आसमां झाँकता हूँ,
फ़रिश्तों को ढूँढता हूँ,
जो स्याही कागज पर खींच पाएँ।

गुमनाम ये जहाँ घूमता हूँ,
स्याही कागज से पोंछता हूँ॥

© रजनीश राजन

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