मैं पागल भंवरा क्यों मंडराया,
उस सुन्दर कली के ओठों पर।
महका कर अपनी खुशबू जिसने,
पंखुड़ियां बिखराईं बातों पर।
मैं भरमाया, पागल भंवरा,
सोचा न समझा, प्यार किया।
क्या देखा और क्या पाया उसने,
महक बिखेरी, भरमाया उसने।
सुंदरता या मेरे गीतों को जाना,
या मेरी मधुर मुस्कानों को माना।
महक बिखेरी, खुशबू फैलाई,
पर खुद को मैं पहचान न पाया।
महक उड़ेली, बगिया महकाई,
नशे में भंवरा, कलियाँ ढूँढता।
गलियों से होकर, बगिया में आया,
पर उसे कभी मैं पहचान न पाया।
क्या शर्म थी, या हया थी उसमें?
पागल भंवरे को भरमाया जिसने।
दिल से अपने, दिल को लगाकर,
मन से भंवरे को, भटकाया उसने।
गर श्रृंगारित भाषा मैंने बोली,
तो वो भी प्यार की भाषा बोली।
पर मन को प्यार से भरकर उसने,
मेरे दिल में नफरत सुलगाई।
बन बावरिया, पहन झांझरिया,
पंखुड़ियों संग मस्ती कर शरमाई।
गर हया बची थी इतनी उसमें,
तो भंवरे को क्यों भरमाया उसने?
तन सुन्दर था, मन था मनमोहक,
बिजली बन, बगिया की शोभा।
दिन रात जो उजियाला फैलाती थी,
वो क्यों मुझ पर बिजली बरपा गई?
मन को संजोया, सब कुछ लुटा,
बना बावरिया, मैं सांवरिया।
थी जो कभी इस भंवरे की लैला,
बन इठलाई अब दूजे की लैला।
गर प्यासी थी उसकी अभिलाषा,
तो भंवरे को वह बतला जाती।
यूँ चुपके से जाना, क्या अच्छा था?
वह भंवरे को बस भरमा गई।
© रजनीश राजन ✍️