याद: एक तीखी चुभन Poem by Rajnish Rajan

याद: एक तीखी चुभन

मैं रोता हूँ, फिर सोता हूँ,
तेरी यादों में मैं जीता हूँ।
खो जाता हूँ नींदों में,
कोई सपना नहीं होता वो।

नींद यहाँ आराम नहीं,
नींदों में भी बेचैनी है।
बेचैनी ऐसी मानो,
यादें कांटों-सी तीखी चुभती हैं।

मिनटों-घंटों में नींद खुलती है,
यादें तेरी झकझोरती हैं,
मुझको नींदों से जगाती हैं।

तेरी यादों की सुनामी,
आँखों से मेरी बहती है।
प्रवाह का वेग इतना,
सारी रात मुझे तड़पाती है।

यादें इतनी लंबी तेरी,
रात-रात भर खोता हूँ।
तेरी यादों में खोकर,
रात-रात भर रोता हूँ।

सुबक-सुबक कर रोता हूँ,
खुलकर नहीं रो पाता हूँ।
मर्दों की टोली में रहता,
साँसें भी सँभाल कर लेता हूँ।

तेरी यादें भी एक राज-सी,
खुलकर न मैं रो पाता।
जीकर मैं न सो पाता हूँ,
तेरी यादों को छुपाए-से,
घुट-घुट कर मैं मरता हूँ।

खुद को मैं समेटकर,
कंबल में लपेटे हुए।
भीगे कंबल, आँखों से—
बातें नहीं पूरी होतीं,
यादों में तेरी बातें आतीं।

मेरी आँखें रोतीं, रात कराहती,
नींदों को दो घूँट पिलाती।
यादें फिर टकराती हैं,
नींदों में भी जगाती हैं।

सारी रात मुझे तड़पाती है,
यादें तेरी सताती हैं।

मेरी रूह मुझे टटोलती है,
मुझको खोया-खोया-सा पाती है।
रूह भी अब घबराई-सी,
मेरे ख्वाबों को समेटे-से।

हाँ, रोम-रोम को राख किया मैं,
अब रूह जलाकर जीता हूँ मैं।
यादों में तुमको जीता हूँ,
तू साकी, तेरी यादों को पीता हूँ मैं।

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