नाज़-ए-जवानी Poem by Rajnish Rajan

नाज़-ए-जवानी

ग़ज़ब का इश्क है ' मोहब्बत',
ये दिल की कज-अदाई है.......।

नज़ाकत-ए-पुरजोश तेरा मिजाज,
इश्क में मशरूफ़ तेरी जवानी है।
घायल करती हैं मेरी-तेरी निगाहें,
उल्फ़त-ए-इश्क आज शबाब पर है।

धड़कन की खलिश,
और तेरी घुँघरू की छनक—
शोर मचाती है गलियों में।
चितचोर, फरेबी नज़रें जमी हैं,
तेरी आँखों के उस सुरमे पे।

ख्वाहिश तेरे इश्क की,
मुद्दतों बाद छाई है।
ग़ज़ब का इश्क है मोहब्बत,
ये दिल की कज-अदाई है।

धधकती उम्र से भड़का,
जवानी, तरन्नुम का चर्खा;
तबस्सुम आँखों से करना,
तकल्लुफ़ होठों से होता है।

फूलों की वेणी जुल्फों पर,
बिंदी का शगुन तेरे माथे पर।
सजाऊँ हाथ से अपने,
मुकद्दर की ख्वाहिश करता हूँ।

ख्वाबिदा इश्क की,
क़ुर्बत-ए-क़ल्ब की रवानी।
मनमोहक तेरी जवानी,
नायाब तेरी निगाहें।

उफ़! मेरी-तेरी ये कहानी,
ग़ज़ब का शोर है गलियों में—
नाज़-ए-जवानी।

उफ़! तेरा ये तपिश-ए-बदन,
होठों का बेपरवाह संगम।
मचलती तेरी खूबसूरत जवानी,
और अंगीठी लेती तेरी निगाहें।

उफ़! तेरा ये खूबसूरत बदन,
और मेरी वजह...
छटकती तेरी ये रवानी,
नाज़-ए-जवानी।

© रजनीश राजन ✍️

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