मैं और मेरा वजूद...
बदलता अपना स्वरूप;
पास है वो मेरे—
जो देता 'मैं' को एक नया रूप।
वजूद—
कभी रुकता नहीं,
हमेशा एक कदम आगे चलता है।
वजूद—एक प्रेरणा;
जो हर वक्त, नई चीज़ का मतलब सिखाता है।
वजूद—एक इकाई;
जो साख, आत्म-सम्मान और मेरी पहचान है।
वजूद—
होने का वो एहसास है,
जो अपने कर्मों और सोच से आता है।
वजूद—एक अंश;
जैसे बूँद का वजूद समंदर है।
वजूद—एक 'अहं',
जो दूसरों से अलग, एक स्वतंत्र इकाई बनाता है।
वजूद—एक आत्म-बोध, एक जिज्ञासा का स्रोत—
जो खुद को भी रोशन करता है।
वजूद—एक निशान है,
जो मेरे मरने के बाद भी, मुझे ज़िंदा रखता है।
वजूद—एक आंतरिक चेतना,
जिससे मैं हमेशा... कुछ नया सीखता हूँ।
वजूद—कोई कल्पना मात्र नहीं,
बल्कि मेरे कर्मों की पहचान है।
वजूद—एक जड़, एक शक्ति,
जो मुझे संभाले हुए है।
मैं... और जब मेरा वजूद साथ में;
तब ही मेरा वजूद।
© रजनीश राजन ✍️