नियति का सच Poem by Rajnish Rajan

नियति का सच

नज़्मों के दरख्तों के साये में,
रफ्ता रफ्ता मैं चला।
बात हुई मदमस्त वहां,
जहां इक हसीना से इकरार हुआ।

मिलन हुआ जो मदहोशी में,
कुछ इस कदर असर हुआ।
कि ठहरी रही वो रात वहीं,
शाम से सबेरा हो न सका।

फ़लक के सितारों से छुपाकर,
अपने अश्क को।
मुकम्मल,
हमने वो शाम किया।

अफसाने पढ़े, इश्क किया
नफ़साने लिखे, मसरूफ़ किया।
गंगा की बहती सी धारा,
शुद्ध समागम का इज़हार किया।

इश्क किए हम दिलवालों ने,
जब हमारा वस्ल हुआ।
वफ़ा के हर एक पन्ने पर,
प्यार के पैमाने खूब लिखा।

हां इश्क अधूरा रहता है, प्यार अधूरा होता है,
रब भी इस नियति को बदल न सका।
धड़कन में बहती संगम से,
कुछ खास हमारा हो ना सका।

जुदा हुए हम तीरों सा,
फिर कभी हम मिल न सके।
जब कान्हा से राधा छूटी,
तो मनुष्य की विसात क्या।
अधूरेपन की इस नियति को,
हमने भी तस्लीम किया।

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