'कहो तो, नज़्म में इबादत लिख दूँ...
हाँ कहो तो सही, मैं इबादत में तेरी... पूरी ये नज़्म लिख दूँ।' ❤️
आ रही हो क्या?
इंतज़ार में बैठा हूँ,
राह में आँखें बिछाए बैठा हूँ।
कहो तो,
नगमों में इंतज़ार लिख दूँ?
बस हाँ तो कहो,
इल्तज़ा करते-करते,
मैं अपनी पूरी शाम लिख दूँ।
शाम-ओ-शबाब ही सही,
शराब लिए बैठा हूँ;
गहरा रही हैं मेरी आँखें,
कहो तो सही,
मैं अपनी पूरी रात लिख दूँ।
तेरी खैरियत लिखूँ,
यह एहसास है मेरा।
इश्क हुआ है मुझे,
अब यह इंतहा है मेरी।
इंतहा-ए-उल्फ़त हो न जाए,
शाम से सुबह हो न जाए;
तड़प है तेरी खैरियत की,
कहो तो सही,
यह पूरी कायनात लिख जाऊँ।
याद आ रही हो,
कुछ सोच रही हो क्या?
कहो तो सही,
हाँ, यादों में ही सही,
पर आओ तो सही।
यादों में सफर मत बढ़ाओ,
दिल की कसक तो जगाओ;
अरमान बिखर रहे हैं मेरे,
कहो तो सही,
आ रही हो क्या?
सच-सच तुम भी बताना,
तुम भी अब बिखर रही हो क्या?
कहा था तुमने—
'आऊँगी मैं।'
ठहर गया हूँ यहाँ,
आँखें लगाए बैठा हूँ मैं।
आ रही हो क्या?
कहो तो सही,
नज़्म में इबादत लिख दूँ।
हाँ, कहो तो सही,
मैं इबादत में तेरी,
पूरी यह नज़्म लिख दूँ!
कहो तो सही।
© रजनीश राजन ✍️
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