मर्द हूँ ना Poem by Rajnish Rajan

मर्द हूँ ना

दर्द होता है,
आह सकुचाती है।
मर्द हूँ न,
आँसू कराहते हैं।

गर्त में हूँ मैं,
रो नहीं सकता।
मर्द हूँ न,
कह नहीं सकता।

कौन कहता है,
मर्द को दर्द नहीं होता?
होता है, बहुत होता है।
रो लेता है मन,
कहीं गलियों में छुपकर।

घुटता है मन,
अंदर ही अंदर।
किसको सुनाऊँ बातें?
हँसता हूँ रोकर।

हँस देता हूँ,
सभी के सामने मैं अक्सर।
कमज़ोर न कहलाऊँ,
मुस्कान सजाता हूँ चेहरे पर।

समंदर छुपा रखा है,
अपने अंदर।
बिखरकर जुड़ता हूँ हर पल,
मुस्कान सजाता हूँ चेहरे पर।

टूटते ख्वाब, बढ़ती प्यास,
जिम्मेदारियों का एहसास।
हँसने और हँसाने वाले पल,
रात को सपनों में आते हैं।

ढहते घर,
बाबू जी की ढलती उम्र,
ममतामयी माँ की आँखें,
चिल्लाती जिम्मेदारियाँ,
बच्चों की पढ़ाई,
बीबी का खर्चा,
भविष्य की चिंता।

रोने का ख्वाब,
काश! देख सकता।
मर्द हूँ न,
रो नहीं सकता।

© रजनीश राजन ✍️

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