! ! द्वार खड़े संकट के आसार! ! Poem by Rajnish Rajan

! ! द्वार खड़े संकट के आसार! !

गाय आस-पास जब वास करे,
सकारात्मकता वह उपजाती है।
गौ नयनों की संरचना समझो,
साक्षात् स्वर्ग दर्शन करवाती है।

समस्त जीवों की पोषक गैया,
दूध-धारा से अमृत जब पाय।
जीव तृप्त हो जीवन जब पाए,
यूं अमृत की लालसा खो जाय।

पुकार रहा वह रत्न पंचगव्य,
औषधीय गुणों से भरपूर है।
गंगा मैया की पवित्र ये धरती,
गौ-भक्ति में ही तो सरूर है।

कान्हा सखी वह गाय हमारी,
धरती पर कान्हा का वरदान है।
एक गाय केवल पशु नहीं,
वह तो हम सबका सम्मान है।

अंग-अंग में करता देव वास,
वह शक्ति हमारी माता है।
घास खाकर जो अमृत दे,
सृष्टि से गहरा उसका नाता है।

अंग-अंग में जब देव बसें,
हो भारत में फिर संहार नहीं।
गुजर रहा संकट से भारत,
हो रहा अब गौ संहार यहीं।

वेद ऋचा जब क्रंदन करती,
तो कहो कैसे कान्हा मुस्काय?
यहाँ धर्म ध्वजा फहराने वाले,
क्यों भूल गए तुम धर्म की लाज?

आज क्रोध उदासी में गुरु संतन,
कहें गौ रक्षा में सब आगे आय।
पुकार रही गैया खानों से,
हार रहा क्यों हिंदू विश्वास?

जागो हिंदू अब आँखें खोलो,
द्वार खड़े संकट के आसार।
हाँ गौ में कोटि देव बसे,
मुक्ति के ये हैं पावन द्वार।

जागो हिंदू अब आँखें खोलो,
द्वार खड़े संकट के आसार।
© रजनीश राजन ✍️

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