बर्ग-ए-गुलाब की छेनी Poem by Rajnish Rajan

बर्ग-ए-गुलाब की छेनी

वो होगी पत्थर-दिल किसी और के लिए,
बुततराश हूँ मैं; पत्थर को स्वरूप देता हूँ।

बुत-शिकन होगा वो तराशने की ज़िद में उसने,
जिसने मेरे इश्क को ही पत्थर-दिल बना दिया।

नफ़ासत से तराशूँ, ज़िद कर तू मुझसे बचने की;
अज़ियत-ए-इश्क हूँ, तख़्लीक़ से पैकर करूँगा।

रेज़ा-रेज़ा संवारना फ़ितरत है मेरी, तू नखरे दिखा;
मुअ़य्यन तराशकर ज़र्रा, मैं एक महबूब बना दूँगा।

रुको, ठहरो थोड़ा तुममें एहसास भर दूँ, कमी क्यों हो?
रेज़ा-रेज़ा तराशा हूँ ज़र्रे को; एक सुंदर सा आवाज़ दे दूँ।

बेजोड़ हुनर है तुममें नफ़ासत से नखरे दिखाने की,
खलिश अब नहीं है मुझमें; तुम मेरी महबूब हो गई।

गर-मगर और ये 'काश' कहूँ, अगर तू तू न होती,
बर्ग-ए-गुलाब की छेनी से तुमको क्यों तराशता?

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