तल्ख़ी काम न आए,
शबनम शाम न छाए,
मुस्कुराकर आँखें मीचना,
हमेशा प्यार नहीं होता।
प्यार करते हो,
बिखर जाओगे,
टूटकर शीशे की तरह,
सिमट न पाओगे,
बिखरकर,
कभी आईने की तरह।
प्यार की शाम आ जाए,
हकीकत इल्ज़ाम बन जाए,
गुनाह तब क्या होगा!
नाम जब बदनाम हो जाए।
महकमा बदनामी का
अगर इल्ज़ाम बन जाए,
ज़रा संभल कर चलना
कहीं इंतहा न हो जाए।
एहसास ढूँढती है नज़र
मगर काश ऐसा होता,
कि प्यार तबीयत से होता,
और इश्क़ नवाब हो जाता।
© रजनीश राजन ✍️
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem