बिगड़ी चाल उन रातों की है बात,
फिरकी सिसकियां साये के साथ।
सारी रातें, उड़ती नींदें, आंसू हाथ,
कराहती बातें और बहती सी याद।
उमड़ी यूं धारा, वो प्रवाह गुमशुदा,
धुंधलाती रातें, उसकी तिश्नगी बात।
मलाल में बैठा, सहकती सी संवाद,
मैं दर-ब-दर, उसकी बहकी सी चाल।
मैं बेसबर, वो सिसकती सी रात,
तड़पन यूं मेरी, फफकते आंसू।
खामोश लब्ज़ हैं, यूं होंठ सिला सा,
बहकी चालें, मैं फिरता सा पागल।
लब्ज़ सिले हैं, होंठ हैं गुमसुम,
गहरा रही है ये नब्ज़ की धारा।
खामोश रातें, उड़ते नहीं जुगनू,
कराहती बातें, पसरती सी याद।
मै जहन्नुम हुआ, थी कसकसाती रात,
उनकी बिगड़ी चाल, कर आई श्रृंगार।
बेगाना होना था, कि कैफियत की बात,
कराहती रात, उनकी भटकती सी याद।
© रजनीश राजन
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