मुद्दतें शाम हो गईं,
तड़प भी ग़मगीन हो गई।
उदासी शाम की हद है,
कहानी अफ़सोस रह गई।
गुम हो गई थी वो प्यार में,
इश्क़ का एहसास न रहा।
सुना है, मशगूल हो गई है वो,
अब किसी और के प्यार में।
मशरूफ़ियत कैसे कहूँ,
फ़िक्र इबादत की है।
शिकवा नहीं अब मुझे,
गिला की इंतहा हो गई।
तड़प की टीस का एहसास,
सनम की गलियों में क्या था।
हुस्न-ए-ख़्वाहिश ना थी,
वफ़ा इश्क़ में बेवफ़ा हो गई।
गुलशन-ए-इश्क़ हो उसका,
इबादत क़ुबूल हो उनका।
बेवफ़ाई की शाम ना आए,
दुआएँ मक़बूल हों मेरी।
सुना था मोहब्बत रंग लाती है,
यहाँ मेरी कहानी शाम हो गई।
मुद्दते-गुलफ़ाक़ का ज़िक्र ही क्या,
मौत भी कमबख़्त बदनाम हो गई।
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