।। तू मेरी मधुशाला ।। Poem by Rajnish Rajan

।। तू मेरी मधुशाला ।।

तेरी खुशबू से तुझको ढूंढता, मदिरालय से मैं गुज़रने वाला;
मैं पीने वाला, मय की गंध से मदिरालय में न जाने वाला।
मदमाता मैं बस तेरी छुअन से, मैं साकी पर मर मिटने वाला;
अधर रसीला, तू मेरी हाला, तेरे होठों से रस मैं पीने वाला ।
तू मदभरी मेरी मधुशाला, मैं बस मदिरालय में जाने वाला ॥

मद-मुद्रा में मैं आऊँ उससे पहले, तुमको साँसों में भर लूँ;
साँसों में भरकर तुम्हें, आलिंगन करूँ—मदिरालय में जाऊँ।
मदमाता मैं तेरी चाहत से, मदिरालय में मदहोशी ना छाए;
तू साकी, तेरा अधर ही प्याला, बस मदिरालय में जाने वाला ॥

मदमस्त नहीं मधुशाला में, मदमाता जब तेरे अधरों से पीता;
मैं मदिरालय में बस जाने वाला—तू साकी, तू ही मधुशाला।
मख़मूर सरशारी साग़र ना ढूँढता, सुराही-गर्दन से मय पाता;
तेरे अधरों से पीता मैं मदमाता, बस मदिरालय में जाने वाला ॥

तुम मैकश, तू ही मधुपाया, इस दिल की प्यास बुझाने वाली;
तुम पलकों से मद-नयन को, हयापरस्त तुम करने वाली।
तेरी नयन-मधुशाला में मदमाता, मय अधर से न छूने वाला;
मैकदे से पीता मैं मदमाता, बस मदिरालय में जाने वाला ॥

मादकता से मैं गर मदमाता, मदहोशी में सारा मधुशाला पीता;
मद-मंथन कर चाहत-परस्त, मैं लब-ए-जाम पीने वाला।
तेरी आँखें प्याली, तू मधुशाला, मैं मदमाता—तू मेरी नूर-ए-हाला;
अधर-सुधा मैं पीने वाला, हाँ, मैं तेरे चित्त-भ्रम में जीने वाला;
तेरी साँस सुराही, तू ही मधुशाला, बस मदिरालय में जाने वाला ॥

मधुमय प्याले से छलकता, मैं मृग-छौने सी चाल से मदमाता;
लावण्य-मद मैं पीने वाला, तो क्या मदिरालय, क्या मधुशाला?
मद-विभोर मैं अंतर्मन से, मद-सिक्त आलिंगन-पाश तुम्हारा;
तेरी दृष्टि जाम, हृदय मधुशाला, बस मदिरालय में जाने वाला ॥

रोम-हर्षण से मद-मूर्छित होता, तुममें चित्त-विश्राम मैं पाता;
तेरे नयन-कोर से मैं पीने वाला, मदमाता प्राण-सुधा मैं पीता।
मेरी अंग-राग तू मद-मंजरी, तुममें ही मद-मरीचिका मैं पाता;
मधुशाला में गर मदमाता, मदहोशी में सारा मधुशाला पीता;
हाँ, दृष्टि-कौमुदी में जीने वाला, बस मदिरालय में जाने वाला ॥

सजदा-ए-साकी तेरी मदहोशी में, अदृश्य जाम मैं पीता हूँ;
तू ही मधुशाला, मदिरालय में जाकर मदिरा-अधर ना छूता हूँ।
मैं कर-लकीर से पीने वाला, तो क्या मदिरालय, क्या मधुशाला?
तेरी देह-लतिका मदगंधा है; तू मदिरालय, तू ही मेरी मधुशाला।
तू मद-कलश है, तू मदमयी, बस मदिरालय में जाने वाला ॥

अक्स गुलाबी, आँखें शराबी, मैं स्वयं को तुझमें घोलने वाला;
तेरी पायल रिमझिम मख़मूरी, मैं उस मय में मय होने वाला;
जब आहट मय, तेरी चाहत मय, मैं रोम-रोम से झूमने वाला;
तेरा बदन सुराही, तू मधुशाला, बस मदिरालय में जाने वाला ॥

© रजनीश राजन ✍️

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