जायज या नाजायज? Poem by Rajnish Rajan

जायज या नाजायज?

राख है मेरी ज़िन्दगी, बख़ूबी मैं समझता हूँ।
अजीब था मैं, इस दुनियादारी में बेहाल था।

माना तुम बहुत बड़े तोप हो अपने परदादा का,
संभल जाओ अभी भी संभलने का वक़्त है।

आज़ादी चाहिए? दूसरों की भावनाओं को रौंदकर,
कैद हो जाएगा दस पीढ़ी, समाज की नज़रों में।

मूर्ख समझते हो दुनिया को? ऐ मेरे प्यारे मूर्ख!
नाजायज हो गए थे तुम शायद अपने पूर्वजों से।

लड़ाते हो एक-दूसरे को, हाँ कहो तो मानें तुमको,
पता नहीं क्यों? जायज़ की कतार छोटी हो रही है।

दरबदर हो जाओगे सनम, ज़रा बेवफाई तो करो,
इस समाज में वफ़ा तो जायज़ लोग ही कर पाते हैं।

तुम जायज हो या नाजायज, सब समझता है समाज,
ज़रा मर के तो देखो, सराहता है या थूकता है समाज।

ये रंजिशें और तंज-ओ-ताने सब फ़िज़ूल हैं,
ख़ाक तकरार करूँ तुमसे, मैं समझदार भी हूँ।

याद रखे जाओगे? थूका जाएगा अगला दस पीढ़ी,
संभल जाओ प्यारे अभी भी संभलने का वक़्त है।

बड़े-बड़े नवाबों को देखा है मैंने श्मशान में,
कौन याद करता है किसको, श्मशान के बाद?

भरोसा नहीं है इस नियति पर तो मर के देखो,
राख-ओ-ख़ाक होकर मिट्टी में मिलते हैं सब।

© रजनीश राजन

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