लिखा तुझे मैं कागज़ पर,
शायद तुम सच में होती।
हाँ, मैं तुम्हारा राजा होता,
तुम होती मेरी शहज़ादी।
मैंने लिखी वह कंचन काया,
मैं अकिंचन तुम्हारी छाया।
चित-चितवन है संध्या वेला,
भटका सा मैं तुम्हारा साया।
मैंने रूप तेरा चित्रण किया,
किया चित्र से प्यार।
नथिया-बाली खूब जड़ी,
पर मिला हाथ ना प्यार।
तेरे यौवन में श्रृंगार जड़ा,
जड़ा रूप में अनुराग।
कंकड़-कांटों में मैं जिया,
तुम हुई न सत्य साकार।
लिखा खूब, कागज़ घिसा,
मिटा घिसी हस्त लकीर।
इश्क-मोहब्बत खूब लिखा,
मुझे मिला हाथ न भीख।
तुमको मैंने जान लिखा,
किया हर अक्षर इज़हार।
प्यार-इश्क सब अधूरे रहे,
हुआ प्यार ना स्वीकार।
लिक्खा तुमको प्रिये कहा,
पंखुड़ियों सा स्वरूप जड़ा।
तुम गीत मेरी बन ना सकी,
मैं मीत तेरा हो ना सका ।
बारिश को बहार लिखा,
लिखा तुमको बूंद-बौछार।
घाट-घाट तेरा नाम लिखा,
मुझे हुआ ना इश्क दीदार।
मैंने तुमको धूप लिखा,
लिखा ना मैंने कोई ग्रहण।
काला बादल मंडरा गया,
नदियां-पानी चारों अंग।
मैंने तुमको छांव लिखा,
ठहरी-ठहरी सी रफ्तार।
दफ्तर-सफर खूब लिखा,
सूखी आंखों बहती धार।
मैंने तुमको चांद लिखा,
सूरज तुमसे जलता है।
थोड़ा क्या शीतल लिखा,
अब जलता सूरज तपता है।
तुमको मैंने मस्तूर लिखा,
मुझसे कैसा है दस्तूर?
बता मेरा कसूर ऐ हुजूर,
मुझको मिला ना तेरा नूर।
मैंने तुमको सरूर लिखा,
था मुझको तुम पर गुरूर।
रूह ना जाना मैं साकी,
खूब लिखा मैंने तेरा रूप।
कहीं मैंने आफरीन लिखा,
तुम हुई ना मेरी नाज़नीन।
था शोहरत से मशहूर मैं,
अब ये इश्क हुआ संगीन।
कहीं मैंने कचनार लिखा,
रखा हाथ साथ में फूल।
किसी ने मुझसे मूर्ख कहा,
मैं प्यार में पागल मूढ़।
मैंने तुमको वफ़ा लिखा,
मिला ना मुझको भ्रम।
भ्रम भी गर मिल जाता,
टूट जाता प्यार का भ्रम।
फिर मैंने बेवफ़ा लिखा,
बदली स्याही अब नीर।
आंखें मेरी स्याह हुईं,
मिली न मुझको हीर।
मैं-ही-मैं में आशिक हुआ,
तुम हुई न मेरी मीत।
सपना सपना रह गया,
ना हुआ गीत संगीत।
गिला सबा से है मेरी,
बहती मस्त सी चाल।
मुझमें वो जलन करे,
न मीत मिला न प्यार।
भला, खता हमारी होगी माना,
कुछ सजा तो मुझको था सुनना।
क्यों? कागजी काम पक्के होते हैं,
जाना, कागजी सब कच्चे होते हैं।
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