मैं बिहार हूँ,
कोई पुकारे 'ऐ बिहार', कोई कहे 'बिहारी' है,
पर गर्व से भर जाता हूँ मैं, ये पहचान ही न्यारी है।
जानकर ये हर्षित होता हूँ— कि हाँ, मैं बिहार हूँ।
परदेश की इस माटी में, मैं ही तो बिहार हूँ,
मेरी बोली, मेरे शब्दों का, सब करते इंतज़ार हैं।
मेरे चाल-चलन की बातें हों, या काम को मेरे सलाम मिले,
तब लगता है मैं एक बिहारी ही नहीं— बल्कि साक्षात् बिहार हूँ।
मैं 'मैं' को भूलकर 'हम' में जीना, बचपन से ही सीखता हूँ,
मैं खुद में एक पूरा बिहार समेटे, अपनी राहें लिखता हूँ।
परदेश की जिस भी माटी पर, मेरे कदम ठहर जाते हैं,
वहाँ बिहार की सोंधी खुशबू और मिठास बिखेर आता हूँ।
जब लोग पूछें 'कैसन बा? ', मैं 'ठीक बा' कह देता हूँ,
उनकी मुस्कानों के पीछे, मैं सारा बिहार समेट लेता हूँ।
जब लिट्टी-चोखे की विधि और मसालों का मैं वर्णन करता हूँ,
उनके स्वादभरे 'आह' में— मैं ही बिहार बन जाता हूँ।
दिवाली के बाद जब गूँजती है, उन गलियों में छठ की बातें,
सूर्य को अर्घ्य, ठेकुआ का प्रसाद, और वो पावन रातें।
जब पूछते हैं वो 'छठ का कोई गीत सुनाओ ना',
तब उस शारदा-स्वर की गूँज में— मैं ही बिहार बन जाता हूँ।
जब UPSC के पन्नों पर, मेरे सूबे का नाम चमकता है,
'कैसा रहा परिणाम बिहार का? ', सारा देश जब पूछता है।
जब कठिन सवालों के हल मैं, पल भर में निकालता हूँ,
नालंदा का ज्ञान लिए— मैं ही बिहार बन जाता हूँ।
वो बुद्ध, महावीर की धरती, और गुरु गोबिंद का तेज यहाँ,
आर्यभट्ट और चाणक्य की, नीति का परचम आज कहाँ?
जब धूप में जलकर पसीने से, मैं अपनी तकदीर सजाता हूँ,
दशरथ मांझी का हौसला लिए— मैं ही बिहार बन जाता हूँ।
जब 'रउआ' और 'जी' की मिठास, मेरी तहजीब दिखाती है,
मधुबनी के रंगों से जब, मेरी जड़ें मुस्कान पाती हैं।
जब आँखों को मूँदूँ तो, कानों में गंगा की लहरें गूँजें,
उस घाटों वाली सादगी में— मैं ही बिहार बन जाता हूँ।
अब समझ में आता है, क्यों 'मैं' नहीं 'हम' कहता हूँ,
लाज़मी है कि मैं साथ में, पूरा बिहार लिए चलता हूँ।
मुझे सरसरी निगाहों से देखकर, जब कोई पूछे, 'कहाँ से हो? '
और ये सुनकर कि 'मैं बिहार से हूँ', वो कहे 'बहुत अच्छा'।
तब उस सम्मान के क्षण में मुझे ये अहसास होता है,
कि मैं कोई एक व्यक्ति नहीं- मैं ही सम्पूर्ण बिहार हूँ।
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