दहेज: दोहरी मानसिकता Poem by Rajnish Rajan

दहेज: दोहरी मानसिकता

दहेज लेना... एक कानूनी अपराध,
कहा गया देना... सबसे बड़ा पाप।
माना कि दहेज............लेना-देना
......है एक सामाजिक अभिशाप।

मैं कट्टर पक्षधर हूं,
दहेज विरोधी कानून का,
क्यों ना होऊं...
बात है बेटी के सम्मान का।

बेटी कोई बोझ नहीं जिसको मैं बेचूं,
और बेटी कोई तोप नहीं...............
जिसके लिए..........
............... मैं दुल्हा दहेज से खरीदूं।

खरीद-फरोख्त की कड़वी बातें...
लड़के पक्ष की...... रंगरूटी बातें।
'हमको आपसे कुछ नहीं है मांगे,
बस........
लड़की का सम्मान बनाए रखना।'

बेटी मेरी..........कोई वस्तु नहीं
इसका...अपना आत्मसम्मान है
बेटा उसका......कोई सब्जी नहीं
..............जिसको मैं खरीद सकूं।

लेकिन सोचता हूँ...
मुझे दामाद नौकरी वाला चाहिए,
लड़का अच्छा है, पढ़ा लिखा है,
अच्छे परिवार से है, कमा लेता है,
लेकिन दामाद नौकरी वाला चाहिए।

बेटी सोना है, लाखों कमाती है
लड़का................बेरोजगार है
सरकारी नौकरी वाला.. नहीं है
मुझे दामाद नौकरी वाला चाहिए।

'बेटी, ............लड़का अच्छा है
सुंदर - सुशील है, बेरोजगार है
शादी करोगी क्या...........? '
'क्या बाबूजी.......................?
लड़का नौकरी वाला चाहिए।

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