आओगी क्या? Poem by Rajnish Rajan

आओगी क्या?

तुम उस दिन आई
और फिर चली गई,
ना जाने क्यों लगता है
तुम मुझे अधूरा करके
कहीं मुझमें सिमट गई।

हवाओं के ज़रिए
अपना भाव भेजा हूँ,
पढ़ लेना मुझे
मैं कहूँ तुझे,
मैं आसान हूँ
बस तुम्हारे लिए।

आओगी क्या?
हवाओं से कहना,
पछुआ हवा से कहना,
मेरे घर पूरब होकर आए,
ज़रूर कहना,
आओगी क्या?

और सुनो तुम
हवाओं की ज़ुल्फों में
एक फूल लगा देना,
और सुनो उस फूल पे
मेरा नाम लिखोगी क्या?

फूल पे मेरा नाम
देखकर
समझूँ कि तुम आओगी?
लिखो... मेरा नाम लिखोगी क्या?

सुनो,
फूल पे अपनी तुम
महक बिखेरना
सुनो
महक बिखेरोगी क्या?

हवाओं से कहना
फ़िज़ाओं से, राह में
चलते-चलते
कहीं इश्क़ न करें।

तुम्हारे होने की आहट
लेकर भोर का समय
सुबह चार बजे
मेरे घर आकर
वो भोर का समय
तुम्हारी आहट बताएगी क्या?

सुनो, कह ही दो ना
उन किरणों से
जो तुम्हारे दरवाज़े पे
पहले दस्तक देती हैं
फिर मेरे घर,
कहना किरणों से
तुम्हारी रोशनी लेकर
वो आएगी क्या?

सुना है
तेरे घर के भँवरे
बहुत अच्छा गाते हैं,
कहो ना भँवरे से
उस फूल के पीछे-पीछे मेरे
घर आएँ,
कहोगी क्या?

भँवरे को कोई
गीत नहीं, बल्कि
बता के भेजोगी क्या?
मैं इंतज़ार में...
कि तुम आओगी क्या?

मैं वही बैठूँ
जहाँ तुम मिली थीं मुझे,
कह देना उन हवाओं से
मुझसे तकरार करें, और बताएँ
कि तुम आओगी क्या?
© रजनीश राजन ✍️

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