एक झूठा रिश्ता Poem by Rajnish Rajan

एक झूठा रिश्ता

तुम्हारे-हमारे बीच एक रिश्ता था,
कि मैं तेरी और तुम मेरी रूह को
बखूबी महसूस किया करते थे।
आज वो दिन है कि
एक सच छुपाने के लिए
तुमने मुझसे मुंह मोड़ लिया।

क्या लगता है तुमको,
कि मैं सच से बेपरवाह हूं?
अब दूर ही सही
लेकिन तेरी रूह में अभी भी
एक छोटा-सा मकान
बनाए हुए बैठा हूं।

परख रहा था मैं तुम्हारी
खैरियत से कैफियत को,
कि सच्चाई ने अभी तलक
तेरी जुबान नहीं पकड़ी है।

सोचता हूं कि अब उजाड़ दूं
उस मकान को,
मैं सच बोलूं कि तुम
अब एक दिन उस मकान को
ढहाने की सोच रही हो।

कहो तो मैं बोल दूं क्या
तुम्हारी पर्दा-नशीं उन बातों को?
चलो छोड़ो, क्यों बताऊं,
तुम अब मेरी नहीं।

100 टका विश्वास करता था मैं
तुम पर,
पर तुम झूठ भी नहीं,
मुझसे सच्चाई छिपाया करती हो।

© रजनीश राजन ✍️

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