।। कागजी शहजादी ।। Poem by Rajnish Rajan

।। कागजी शहजादी ।।

लिखा तुझे मैं कागज़ पर, शायद तुम सच में होती।
हाँ, मैं तुम्हारा राजा होता, तुम होती मेरी शहज़ादी।।

लिखी मैंने वह कंचन काया, मैं अकिंचन तुम्हारी छाया।
चित-चितवन है संध्या वेला, भटका सा मैं तुम्हारा साया।।

तेरा रूप मैंने चित्रण किया, किया मैंने इस चित्र से प्यार।
नथिया-बाली खूब जड़ी, पर मिला न हाथों में हाथ-प्यार।।

तेरे यौवन में श्रृंगार जड़ा, जड़ा रूप में भी अनुराग।
कंकड़-कांटों में मैं जिया, तुम हुई न सत्य साकार।।

लिखा खूब और कागज़ घिसा, मिटी घिसी ये हस्त-लकीर।
इश्क-मोहब्बत खूब लिखा, मिली न मुझको हाथ की भीख।।

तुमको मैंने अपनी जान लिखा, किया हर अक्षर से इज़हार।
यहाँ प्यार-इश्क सब अधूरे रहे, हुआ न मेरा इश्क स्वीकार।।

लिखा तुमको और प्रिये कहा, पंखुड़ियों-सा स्वरूप जड़ा।
गीत मेरी तुम बन न सकीं, और मैं मीत तेरा हो न सका।।

बारिश को मैंने बहार लिखा, लिखा तुमको ही बूंद-बौछार।
घाट-घाट तेरा नाम लिखा, हुआ न फिर भी इश्क-दीदार।।

मैंने तुमको अपनी धूप लिखा, लिखा न मैंने कोई ग्रहण।
फिर काले बादल मंडरा गए, हाँ पानी-अग्नि चारों अंग।।

मैंने तुमको अपनी छांव लिखा, ठहरी-ठहरी-सी रफ्तार।
दफ्तर-सफर में खूब लिखा, सूखी आँखों बहा ये नीर।।

मैंने तुमको अपना चांद लिखा, सूरज भी तुमसे जलता है।
थोड़ा-सा क्या शीतल लिखा, जलता सूरज अब तपता है।।

तुमको मैंने 'मस्तूर' लिखा, क्या है तेरा मुझसे दस्तूर?
बता दे मेरा कसूर ऐ हुज़ूर, मिला न मुझको तेरा नूर।।

तुमको अपना 'सरूर' लिखा, मुझको तुम पर गुरूर।
तेरी रूह न जानी मैंने साकी, बस लिखा मैंने तेरा रूप।।

कहीं मैंने तुमको 'आफरीन' लिखा, तुम हुई न मेरी 'नाज़नीन'।
था मैं शोहरत से मशहूर कभी, अब ये इश्क हुआ संगीन।।

कहीं मैंने तुमको 'कचनार' लिखा, रखा हाथ में साथ एक फूल।
किसी ने मुझको मूर्ख कहा, हुआ प्यार में पागल सिद्ध।।

मैंने तुमको बस वफ़ा लिखा, मिला न मुझको कोई भ्रम।
भ्रम भी अगर मिल जाता मुझे, टूट जाता ये प्यार का भ्रम।।

फिर मैंने तुमको बेवफ़ा लिखा, बदली स्याही अब बन के नीर।
आँखें मेरी अब स्याह हुईं, मिली न मुझको मेरी हीर।।

मैं-ही-मैं में आशिक हुआ, तुम हुई न मेरी कभी मीत।
सपना बस एक सपना रहा, बना न मेरा कोई गीत।।

गिला सदा इस सबा से रही, बहती जो अपनी मस्त चाल।
मुझसे वो बस जलन करे, मिला न मीत और मिला न प्यार।।

भला खता हमारी ही होगी, कुछ सजा तो मुझको थी सुनना।
कागजी काम पक्के होते हैं, पर कागजी सब कच्चे होते हैं।।

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