फ़रीब - ए - इज़हार Poem by Rajnish Rajan

फ़रीब - ए - इज़हार

फ़रीब - ए - इज़हार हो तो नब्ज़ नासूर हो जाता है।
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आजमाइश दर्द का था, फ़रीब-ए-इज़हार किया उसने,
गनीमत इक़बाल क्या हुआ, मैं स्याह-ए-इश्क़ हो गया ।

इश्क़ में दरक इतना था कि ज़िंदगी नरक हो गई,
नब्ज़ नासूर हो गया, और हम तबाह हो गए।

© रजनीश राजन ✍️

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