'मेरी यादों में मत आओ' Poem by Rajnish Rajan

'मेरी यादों में मत आओ'

ये सफ़र जो आज तन्हा है, रहनुमा तेरी यादों में;
बेसबर हम अकेले हैं, कोई अख़बार नहीं तेरी।
तेरी यादें भी तन्हा हैं, मुकद्दर अश्क बहाता है;
मंजिलें चैन ढूंढती हैं, सफ़र भी खूब हंसता है।

कभी हम साथ हंसते थे, कभी हम साथ जीते थे,
मगर अब हाल ये मेरा, कि ख़ुद पर मलाल रहता है।
ना मुझको चैन मिलता है, ना सुकून मिलता है;
बेखबर इश्क क्या समझे, मुकद्दर अश्क बहाता है।

मैं तेरी सूरत सजाता हूँ, तेरी यादों में जीता हूँ;
बहकी शाम लगती है, ना कोई अहवाल मिलता है।
शराबी शाम भी मुझसे, सफर का हाल पूछती है;
ना कोई अख़बार मिलता है, ना अहवाल दिखता है।

जहां हो खूब रहना तुम, मेरी यादों में मत आओ;
तेरी यादें कंटीली हैं, हर एहसास चुभता है।
तेरी यादों का बसेरा हूं, तेरे एहसास में जीता हूं;
सफर जो आज तन्हा है, सफ़र भी खूब हंसता है।

मैं कभी अख़बार ढूंढता हूँ, तेरी यादों में जीता हूँ;
मेरी बेचैनी को समझो, मेरी यादों में मत आओ।

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