जो दो होकर भी दिल से एक थे,
जो दूर होकर भी ह्रदय से पास थे,
वो जैसे प्रेम शब्द का ही भावार्थ है,
वो प्रेम के पुजारी सिर्फ 'राधाकृष्ण'' है ।।
निस्वार्थ प्रेम का उदाहरण है वो,
सच्ची भावना का प्रतीक है वो,
मुरलीधर की वो बावरी राधे थी,
राधा रानी के वो दुल्हारे कान्हा थे ।।
उनके रोम रोम मे सिर्फ प्रेम था,
दोनों को एक दुजे का साथ था,
अगर राधा को चोट लगती थी,
न जाने कृष्ण की आँख क्यू भर आती थी ।।
बिना बोले समजते थे वो एक दुजे की बात,
पास ना होकर भी दिल से थे वो हमेशा साथ,
मुरली की धुन सुनकर राधा उसमें ही खो जाती थी,
मटकी भर मख्खन हाथ से वो कान्हा को खिलाती थी ।।
वो नटखट सा कान्हा उसे तंग भी बहुत करता था,
लेकिन राधा रानी की सारी इच्छाये भी वही पुरी करता था,
पुरा संसार साक्षी है इनके इसी हर एक-एक पल का,
इसीलिए सिर्फ 'राधाकृष्ण' ही दुसरा नाम है सच्चे प्रेम का ।।
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