(some Lines From) गहराइयों का खौफ़ Poem by Priya Guru

(some Lines From) गहराइयों का खौफ़

गहराइयों का खौफ़ था, अब रहा है कहां मुझे
डूब जाया करता था मैं, आज लेकर आया है कहां मुझे
सुना है क़े, दूर सूदूर तेरे तन पे चांदनी के कुछ धब्बे पड़ते है
एक सांझ छूकर देखू मैं उनको, ज़रा लेकर जा तू वहा मुझे

Monday, October 3, 2016
Topic(s) of this poem: love and art
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