कभी कभी (Sometimes) Poem by Kezia Kezia

कभी कभी (Sometimes)

Rating: 5.0

कभी कभी जब बहुत ऊपर पहुँच जाता हूँ



किसी आंख का आंसू बनकर गिर जाता हूँ

कभी कभी जब नींद से जाग जाता हूँ

बेसिर पैर के ख्वाबों को ओढ़कर खो जाता हूँ

कभी कभी जब अन्धेरे के पैने पंजे मे फँस जाता हूँ

ते़ज चीख़ बनकर निकल जाता हूँ

कभी कभी जब जिंदगी के जुए में हार जाता हूँ

नई जुगत लगाकर अगली बार जीत जाता हूँ

कभी कभी जब भूख से बिलबिलाता हूँ


मुट्ठी भर माटी फांक कर पानी पी जाता हूँ

कभी कभी जब घावों के दर्द से कराहता हूँ

वक़्त का मरहम लगा कर सहलाता हूँ

कभी कभी जब बेहद गमगीन हो जाता हूँ


तारो को चमक कर बुझते देख मुस्कुराता हूँ

कभी कभी जब हसीन कयास की गिरफ्त मे आ जाता हूँ

बदनसीबी का कफन लपेट कर ढेर हो जाता हूँ

कभी कभी जब जिंदगी से बेज़ार हो जाता हूँ

तुम्हे देखने की रब से फरियाद कर पाता हूँ

कभी कभी, जब बहुत थक जाता हूँ

अपनी लाश का तकिया बनाकर सो जाता हूँ

******

Tuesday, March 28, 2017
Topic(s) of this poem: hindi,philosophical
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 28 March 2017

आपकी कविता की भाषा एवम् तेवर दोनों प्रभावित करते हैं. लेकिन कहीं न कहीं कुछ ऐसा अवश्य है जो आपको अवसाद देता है. बेसिर पैर के ख्वाबों को ओढ़कर खो जाता हूँ कभी कभी जब अन्धेरे के पैने पंजे मे फँस जाता हूँ बदनसीबी का कफन लपेट कर ढेर हो जाता हूँ अपनी लाश का तकिया बनाकर सो जाता हूँ

0 0 Reply
Kezia Kezia 28 March 2017

मन के निजी भावों को धता बताकर जब कवि कुछ लिखता है वो समाज का आइना दिखाता है. ये भाव भी समाज से उधार लिये गये हैं. कविता पसंद करने के लिए धन्यवाद

0 0
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success