मेरा घर बसता है इन मकनों के पार कहीं,
पत्थर मकान दे तन को छाया,
मन को तो सबने ठुकराया,
कटु वचनों से हृदय है छलनी,
क्या है इसका उपचार कहीं?
क्यों मैं तुमको स्वीकार नहीं?
मेरी साँझ, सखी, स्वभाव, श्रृंगार, हर शय से क्यों समस्या सबको?
क्यों मुझे देख बंद करते हिय पट को?
तुम्हारे अनुसार अपने को ढाल लूँ, मैं कोई नाटककार नहीं!
क्यों मैं तुमको स्वीकार नहीं?
करते अनादर अभिलाशा का,
मेरे रंग-रूप, हर बाधा का
फिर झूठी मीठी बातों से चाहें सौदा मेरे आदर का,
मगर जान लो,
मैं करता मान का व्यपार नहीं!
क्यों मैं तुमको स्वीकार नहीं?
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