नज़र और नसीब का खेल. Poem by Veer Abhimanyu Sumberia

नज़र और नसीब का खेल.

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जब सफ़र की सीढ़ियों के सबसे नीचले पायदान पर ठहरोगे,
तो नज़रों के दरीचे तुमसे अनजाने ही बंद हो जाएँगे।

कोई आँख तुम्हें देख कर ठहरना भी गवारा न करेगी,
तेरे दर्द का वज़न तुझी पर छोड़, सब राहें किनारा कर लेंगी।

मगर, ऐ राही, जब तेरी साँसों की मेहनत से
तेरी तक़दीर की मिट्टी सोना बन जाएगी

तब वही निगाहें तेरे नाम के चिराग से रोशनी माँगेंगी,
वही क़दम जो तुझसे दूर भागते थे,
तेरे पाँवों की धूल को भी सजदा समझ अपनाएँगे।

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