|| पत्नी और Wi-Fi || Poem by Bal Krishna Mishra

|| पत्नी और Wi-Fi ||

घर में आते ही ऐसा जाल बिछाती है,
अच्छे-भले जीवन का डेटा खा जाती है।

मुफ़्त का हॉटस्पॉट समझकर पास आए थे,
उम्र भर ' अनलिमिटेड प्लान ' का बिल चुकाते हैं।

रेंज में रहो तो पूछताछ सुबह-शाम होती है,
रेंज से बाहर जाओ तो इमरजेंसी एलान होती है।

चैट दोस्तों से करो, तो इसके पास तुरंत 'OTP' जाता है,
आधी रात को भी पति का 'बायोमेट्रिक अंगूठा' लग जाता है।

सोचा था 'Incognito Mode' में जाकर ज़रा चैन से जिएँगे,
ये वो डेंजरस हैकर है जो डिलीटेड चैट भी स्क्रीनशॉट बनाकर लाता है!

हर कॉल, हर मैसेज का ऑडिट हो जाता है,
घर का ड्रॉइंग रूम ही जाँच आयोग बन जाता है।

इसकी मेमोरी ऐसी कि दुनिया दंग रह जाए,
दस साल पुरानी गलती भी तारीख़ सहित याद आ जाए।

मोबाइल पर मुस्कुराओ तो केस नया बन जाता है,
'इतनी खुशी किस बात की? ' प्रश्नों का दौर आ जाता है।

साले की शादी का फ़ंक्शन हो तो इसकी स्पीड '5G' से तेज़ है,
पति बीमार हो तो कहती—'सर्वर डाउन' है, खुद बना लो जो परहेज़ है!

शॉपिंग कार्ट में सामान डालते ही 'क्लिक-टू-पे' एक्टिवेट हो जाता है,
और पति की सैलरी का मैसेज आते ही बैलेंस 'ऑटो-डेबिट' हो जाता है!

पति के सारे पुराने तर्क अपने-आप डिलीट हो जाते हैं।
ज़रा सा पलटकर जवाब दो तो 'Error 404' आ जाता है,

ससुराल वालों का नंबर इसने 'ब्लैकलिस्ट' में डाल रखा है,
और खुद के भाई को पूरे घर का 'प्राइमरी यूजर' बना रखा है!

डेटा नहीं, ये तो चैन और सुकून खा जाती है,
छोटी-सी बात को राष्ट्रीय बहस बना जाती है।

मूड इसका मौसम विभाग भी न समझ पाए,
धूप में भी बादल गरजें, कोई कारण न बतलाए।

डेटा ख़त्म, अब बस शोर-शराबा है,
ये रिश्ता नहीं, नेटवर्क का अजूबा है।

पत्नी चाहे वाई-फाई जैसी हो, या वाई-फाई पत्नी जैसा…
पास रहे तो शिकायत, दूर हो जाए तो घबराहट!

सिग्नल फुल हों तो बहस, सिग्नल गायब हों तो बेचैनी!

भले ही ये 'डेटा' और 'चैन' दोनों उड़ाती है,
पर सच तो ये है जनाब, यही घर को 'स्मार्ट होम' बनाती है।

इसके बिना तो घर का पूरा सिस्टम ही 'क्रैश' हो जाए,
ये न हो तो जिंदगी 'नो इंटरनेट' का डायनासोर बन जाए!

 ~बाल कृष्ण मिश्रा, नई दिल्ली |

|| पत्नी और Wi-Fi ||
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
|| पत्नी और Wi-Fi || पत्नी और Wi-Fi; मेरे लिए केवल एक हास्य कविता नहीं, बल्कि आधुनिक पारिवारिक जीवन को डिजिटल युग की भाषा में देखने का एक मनोरंजक प्रयास है। आज हमारी जिंदगी इंटरनेट, मोबाइल, OTP,5G, स्क्रीनशॉट, ऑटो-डेबिट और स्मार्ट डिवाइस से घिरी हुई है। मैंने इसी डिजिटल संसार के शब्दों और अनुभवों को वैवाहिक जीवन की रोज़मर्रा की नोकझोंक से जोड़कर इस कविता की कल्पना की। Wi-Fi और पत्नी में समानता तलाशना अपने आप में एक हास्यपूर्ण विचार था। कभी " रेंज" में रहना, कभी " सिग्नल" कमजोर होना, कभी " डेटा" खत्म होना और कभी अचानक " नेटवर्क" तेज़ हो जाना—इन तकनीकी परिस्थितियों को जब पारिवारिक जीवन से जोड़ा, तो अनेक हास्यपूर्ण स्थितियाँ अपने आप बनती चली गईं। इस कविता में पति की परेशानियों और पत्नी के स्वभाव को जानबूझकर अतिशयोक्ति और हास्य के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य किसी स्त्री, पत्नी या वैवाहिक संबंध का अपमान करना नहीं है। यह उस घरेलू नोकझोंक पर एक प्रेमपूर्ण व्यंग्य है, जिसे अधिकांश परिवार अपने-अपने तरीके से अनुभव करते हैं। मैंने कविता में आज की डिजिटल पीढ़ी की बोलचाल को भी स्थान दिया है। " OTP" , " Incognito Mode" , " Screenshot" , " 5G" , " Auto-Debit" , " Error 404" , " Blacklist" और " Smart Home" जैसे शब्द मेरे लिए केवल तकनीकी शब्द नहीं, बल्कि हास्य पैदा करने वाले आधुनिक प्रतीक हैं। कविता का सबसे महत्वपूर्ण भाव उसके अंत में छिपा है। सारी शिकायतों और मज़ाक के बावजूद सच्चाई यही है कि— घर केवल दीवारों से नहीं, रिश्तों से चलता है। जिसे हम कभी " डेटा खाने वाला नेटवर्क" कहते हैं, वही हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कनेक्शन भी होता है। इसलिए कविता की अंतिम पंक्तियों में मैंने व्यंग्य को प्रेम और अपनत्व के भाव में बदलने का प्रयास किया है। मेरी दृष्टि में अच्छा हास्य वह है जो किसी को नीचा दिखाकर नहीं, बल्कि अपने ही जीवन की सच्चाइयों पर मुस्कुराने का अवसर देकर हँसाए। " पत्नी और Wi-Fi" उसी मुस्कान को समर्पित एक छोटी-सी कोशिश है। ✍️ रचनाकार — बाल कृष्ण मिश्रा, नई दिल्ली | मोबाइल: 8700462852.
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