rishabh shukla

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rishabh shukla Poems

1. बचपन 10/19/2012

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बचपन

उसे बचपन न समझो वह फुल सी कली है!
जहा न हो बच्चे वह कौन सी गली है! !
कुछ की होती है गर्भ मे हत्या!
तथा कुछ करते है यौवन मे आत्महत्या! !
जब उन्हे लेनी चाहीये शिक्षा!
तब वे मागते है सङको पर भीक्षा! !
कुछ बन जाते है कच्ची उम्र मे छोटु!
लोग इन्हे समझते है मुर्ख और भोंदु! !
कुछ छोटु होटलो मे धोते है प्लेट!
तथा कुछ सोते है भुखे पेट! !
कोइ भी नही देता है उन्हे सहारा!
क्योकी दुनिया के लिये वे है बेसहारा! !
बच्चो का बचपन तुम ना गवाना!
क्योकी बचपन मिलता नही दोबारा! !
अब फुल से बच्चे बन गये है कठोर!
क्योकी उनको भोजन नही मिलता कही और! !
वे है...

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