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(13 March 1997 / Bagaha, Bihar)

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Tumhe Hi...

तुम्हें ही
दूर आसमाँ के साये में इक चेहरा उभरते देखा है
हवा की थिरकन में इक जादू तिरते देखा है
फूलों में कलियों में किसी को महकते देखा है
सूर्य की अग्नि बन कर किसी को दहकते देखा है
आसमाँ में चाँद को किसी से शर्माते देखा है
इन काली घटाओ में उन जुल्फो को लहराते
देखा है
इन जल लहरों के अंतर में इक मस्ती उमड़ते
देखा है
नीले नभ में इन मेघो पर
बैठकर उड़ते देखा है
धरा और गगन को क्षितिज पर मिलते देखा है
इन मस्त फिजाओं में किसी को घुलते देखा है
..हाँ, मैने तुम्हें ही देखा है
वह तुम्ही हो जिसे मैने कण-कण में समाते देखा है
मेरी इन साँसों में आते जाते देखा है।

Submitted: Wednesday, October 09, 2013
Edited: Thursday, November 14, 2013


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Poet's Notes about The Poem

to you..my special one i m searching u in entire nature and i always find u in the core of my heart...you are my way to life

Comments about this poem (Zindagi Tu Ek Kavita Hai... by Madhuraj Kumar )

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