Mukul Kumawat


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Comments about Mukul Kumawat

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  • Mukul Kumawat Mukul Kumawat (12/20/2014 10:24:00 AM)

    it's my first creative.. i hope you will like it.... :)

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Best Poem of Mukul Kumawat

गुरु-समीक्षा

गुरु से बढ़कर इस दुनिया में, न कोई दूजा होवे रे
जो गुरु को कुछ भी न समझे, वो रावण बन रोवे रे

प्रेम-क्रोध तो दो ही रूप है, दया-दृष्टि की महिमा अनूप है
मात-पिता है प्रेम के सागर, गुरु तो शिक्षा का स्तूप है

सत व कुमार्ग को दर्शाते, स्वयं की महिमा कभी न बतलाते
मार्ग भटकने पर समझाते, वही तो असल गुरु कहलाते

हम शिष्य है, गुरु तेरे हवाले, हाथ पकड़ कर चल लेंगे
तू रोकेगा, तू टोकेगा, तू समझाये समझ लेंगे

जो भूल-सूत को ध्यान न रखकर, जग हित भार को ढोवें रे
गुरु से बढ़कर इस दुनिया में, न दूजा कोई होवे रे

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