sanjay kumar maurya

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आतंक - Poem by sanjay kumar maurya

1
उस शहर के लोग
हैं घबराए हुए क्यों
हैं चेहरे मुरझाए हुए क्यों
साथ में कुछ सामान है
स्त्रियां हैं
बच्चें हैं
वृद्ध हैं
आखें मंे भय है
मन मे आघात हैं
तभी तो अपना प्यारा घर छोड़कर
फिर रहें हैं सड़को पर
अफरा तफरी सी है उनके बीच
रुदन, मायूसी, रोना, गिड़गिड़ाना
किसी ने मां
किसी ने बाप
किसी ने भाई
किसी ने बहन
किसी ने बेटा
कुछ न कुछ खोया हुआ है
और इस हृदयाघात में स्वयं को
आंसूओ की दरियां में डूबोया हुआ है

2

वेे लोग जो कह रहे हैं शहर की लोंगो से
कि उनकी लड़ाई है सिर्फ
शहर वालों को हक दिलाने तक का
सब उन्ही का तो कारनामा है
उन्ही ने तो शहर के मासूम आवाम को
ये सड़क
ये भटकन
ये अफरा तफरी
ये जिल्लत
ये रुसवाई
का तोअफा उनके मासूमियत के बदले दिया है
न जाने क्यों फैला रहें हैं
ये चंद लोग अपनों के दरमियां
ये आक्रोश
ये दहशत
जिसकी चक्की में पीसकर आमजन
ऐसी परिस्थित में पहुंचने को मजबूर हैं
जहां अपने ही देश में
अपने ही शहर में
अमन से नहीं रह सकते
अपने खेतों की
अपनी मेहनत से
उगाए हुए गेंहूं की रोटियां
चैन से नहीं खा सकते।

Topic(s) of this poem: terrorism


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Poem Submitted: Thursday, September 3, 2015



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