Sunday, November 15, 2015

अमन परस्त हूँ मुख़लिस परिंदा रहने दो Comments

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अमन परस्त हूँ मुख़लिस परिंदा रहने दो
भाईचारा मेरा अख़लाक़ ज़िंदा रहने दो
ज़मीन ए हिंद किसी एक की जागीर नहीं
नफ़रत की फेज़ा मुल्क में ना बहने दो
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NADIR HASNAIN
COMMENTS
Rajnish Manga 15 November 2015

मैं आपके विचारों का स्वागत व समर्थन करता हूँ. आपने इस देश की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने की ज़रूरत को इस कविता में बखूबी अभिव्यक्ति दी है. बहुत सुंदर. निम्नलिखित पंक्तियाँ प्रभावशाली है: गंगा ज्म्नी मेरी तहज़ीब ज़िंदा रहने दो मक़सद में हो ना कामयाब देश द्रोही नफ़रत की फेज़ा मुल्क में ना बहने दो

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